कलिकाले नाम रुपे कृष्ण अवतार।
नाम हैते हय सर्व जगत् निस्तार।।
नाम बिना कलिकाले नाहि आर धर्म।
सर्वमन्त्रसार नाम एइ शास्त्र मर्म।।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।
नाम हैते हय सर्व जगत् निस्तार।।
नाम बिना कलिकाले नाहि आर धर्म।
सर्वमन्त्रसार नाम एइ शास्त्र मर्म।।
कलियुग में श्रीकृष्ण नाम के रुप में अवतरित हुए हैं। कलियुग
में हरिनाम के अतिरिक्त सभी धर्म व्यर्थ हैं। समस्त मन्त्रों का सार
हरिनाम ही हैं, तथा यही सभी शास्त्रों का निगूढ़ अर्थ हैं।
कलिकल्मष नाशकारी श्रीनामसंकीर्तन
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।
ये सोलह नाम कलियुग के कल्मष को नाश करने वाले हैं, समस्त वेदों का अनुशीलन करने पर इसकी अपेक्षा श्रेष्ठ अन्य कोई उपाय नहीं देखा जाता।
ये सोलह नाम कलियुग के कल्मष को नाश करने वाले हैं, समस्त वेदों का अनुशीलन करने पर इसकी अपेक्षा श्रेष्ठ अन्य कोई उपाय नहीं देखा जाता।
कलियुग में अन्य साधनों की निरर्थकता
हरेर्नामैव नामैव नामैव मम जीवनम्।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा।।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा।।
सत्ययुग में ध्यान, त्रेता में यज्ञ और द्वापर में अर्चन की
प्रधानता होती हैं। परन्तु कलियुग में हरिनाम ही मेरा जीवन हैं, हरिनाम ही
मेरा जीवन हैं, हरिनाम ही मेरा जीवन हैं। कलियुग में हरि नाम के अतिरिक्त
जीव की कोई अन्य गति नहीं हैं। कोई अन्य गति नहीं हैं। कोई अन्य गति नहीं
हैं। कोई अन्य गति नहीं हैं। तीन बार उक्ति द्वारा कलियुग में हरिनाम के
अतिरिक्त अन्य साधनों की निरर्थकता दिखलायी गयी हैं।
नामोच्चारणकारी को कलि के दोष स्पर्श नहीं करते
हरे केशव गोविन्द वासुदेव जगन्मय।
इतीरयन्ति ये नित्यं न हि तान् बाधते कलि:।।
इतीरयन्ति ये नित्यं न हि तान् बाधते कलि:।।
जो लोग नित्यकाल "हे हरे ! हे गोविन्द ! हे केशव ! हे
वासुदेव ! हे जगन्मय !"-ऐसा कहकर कीर्तन करते हैं, उन्हें कलि का प्रभाव
तनिक भी बाधा नहीं दे सकता हैं।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।
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