Showing posts with label नाम. Show all posts
Showing posts with label नाम. Show all posts

Tuesday, 13 October 2015

कलिकाले नाम रुपे कृष्ण अवतार।

कलिकाले नाम रुपे कृष्ण अवतार।
नाम हैते हय सर्व जगत् निस्तार।।
नाम बिना कलिकाले नाहि आर धर्म।
सर्वमन्त्रसार नाम एइ शास्त्र मर्म।।
कलियुग में श्रीकृष्ण नाम के रुप में अवतरित हुए हैं। कलियुग में हरिनाम के अतिरिक्त सभी धर्म व्यर्थ हैं। समस्त मन्त्रों का सार हरिनाम ही हैं, तथा यही सभी शास्त्रों का निगूढ़ अर्थ हैं।
कलिकल्मष नाशकारी श्रीनामसंकीर्तन
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।
ये सोलह नाम कलियुग के कल्मष को नाश करने वाले हैं, समस्त वेदों का अनुशीलन करने पर इसकी अपेक्षा श्रेष्ठ अन्य कोई उपाय नहीं देखा जाता।
कलियुग में अन्य साधनों की निरर्थकता
हरेर्नामैव नामैव नामैव मम जीवनम्।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा।।
सत्ययुग में ध्यान, त्रेता में यज्ञ और द्वापर में अर्चन की प्रधानता होती हैं। परन्तु कलियुग में हरिनाम ही मेरा जीवन हैं, हरिनाम ही मेरा जीवन हैं, हरिनाम ही मेरा जीवन हैं। कलियुग में हरि नाम के अतिरिक्त जीव की कोई अन्य गति नहीं हैं। कोई अन्य गति नहीं हैं। कोई अन्य गति नहीं हैं। कोई अन्य गति नहीं हैं। तीन बार उक्ति द्वारा कलियुग में हरिनाम के अतिरिक्त अन्य साधनों की निरर्थकता दिखलायी गयी हैं।
नामोच्चारणकारी को कलि के दोष स्पर्श नहीं करते
हरे केशव गोविन्द वासुदेव जगन्मय।
इतीरयन्ति ये नित्यं न हि तान् बाधते कलि:।।
जो लोग नित्यकाल "हे हरे ! हे गोविन्द ! हे केशव ! हे वासुदेव ! हे जगन्मय !"-ऐसा कहकर कीर्तन करते हैं, उन्हें कलि का प्रभाव तनिक भी बाधा नहीं दे सकता हैं।
🌸🌷🌸🌷🌸🌷🌸🌷🌸🌷🌸
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।

Thursday, 8 October 2015

श्रीनाम भी श्रीभगवान् के सवरूप की ही भांति मधुर है।



चूंकि श्रीभगवान् एवं उनका नाम दोनों अभिन्न हैं, इसलिए श्रीनाम भी श्रीभगवान् के सवरूप की ही भांति मधुर है।श्री नामाक्षर अप्राकृत चिन्मय हैं।
कृष्णनाम,कृष्णगुण, कृष्णलीलावृन्द
कृष्णेर स्वरूपसम सब चिदानंद"
       (श्री.च.च.२/२७/१३०)
"श्रीकृष्ण नाम, श्रीकृष्ण के गुण एवं श्रीकृष्ण की लीलाएं-यह तीनों श्री कृष्ण के सवरूप की ही भांति चिदानंद सवरूप ही हैं।"
"नाम चिन्मय होने से नाम के अक्षर समूह भी अप्राकृत व् चिन्मय ही हैं।"
याद रखो - किसी भी भय में इतनी शक्ति नही है जो भगवत्कृपा की अपार शक्ति के सामने ठहर सके। किसी भी पाप में इतनी शक्ति नही है जो भगवद्भक्ति के सामने टिक सके। किसी भी ताप में इतनी शक्ति नही है जो भगवत्प्रेम की शीतलता के सामने रह सके। [कल्याण मार्च 2015]
भगवान् शिव माता पार्वती से ::- ''जो लोग भगवान् श्री हरि के शरणागत होते हैं वे किसी से भी नहीं डरते l क्योंकि उन्हें स्वर्ग,मोक्ष और नरकों में भी एक ही वास्तु के -- केवल भगवान् के ही सामान भाव से दर्शन होते हैं l '' ( श्रीमद्भागवत महापुराण ६/१७/२८ )
अनेक व्यक्ति साधना शब्दसे ही डर जाते हैं जबकि कलियुगमें साधना अत्यधिक सरल है, मात्र उठते-बैठते ईश्वरका स्मरण करना कलियुगकी सर्वोत्तम साधना है |
सावधान ! --- कलियुग मैं हरिनाम, हाँ केवल हरिनाम, एकमात्र हरिनाम ही संसार-सागर से पार होने का सर्वोत्तम साधन है | इसके सिवा इस काल में दूसरी कोई गति नही है, नही है, दूसरी कोई गति है ही नही | संत-वाणी संख्या १६३६, गीताप्रेस गोरखपुर
॥श्री राधारमणाय समर्पणं॥

Tuesday, 6 October 2015

भगवान् श्री कृष्ण जी के कुछ नाम और उन के अर्थ:

भगवान् श्री कृष्ण जी के कुछ नाम और उन के अर्थ:
आप सब भी और नाम जोडीये क्रम संख्या डालकर .......
1 कृष्ण : सब को अपनी ओर आकर्षित करने वाला.
2गिरिधर: गिरी: पर्वत ,धर धारण करने वाला। अर्थात गोवर्धन पर्वत को उठाने वाले।
3मुरलीधर: मुरली को धारण करने वाले।
4 पीताम्बर धारी: पीत :पिला, अम्बर:वस्त्र। जिस ने पिले वस्त्रों को धारण किया हुआ है।
5मधुसूदन: मधु नामक दैत्य को मारने वाले।
6 यशोदा या देवकी नंदन: यशोदा और देवकी को खुश करने वाला। या पुत्र
7 गोपाल: गौओं का या पृथ्वी का पालन करने वाला।
8गोविन्द: गौओं का रक्षक।
9 आनंद कंद: आनंद की राशि देंने वाला।
10 कुञ्ज बिहारी:कुंज नामक गली में विहार करने वाला।
11चक्रधारी: जिस ने सुदर्शन चक्र या ज्ञान चक्र या शक्ति चक्र को धारण किया हुआ है
12 श्याम: सांवले रंग वाला
13 माधव: माया के पति।
14 मुरारी:मुर नामक दैत्य के शत्रु।
15 असुरारी:असुरों के शत्रु।
16 बनवारी: वनो में विहार करने वाले।
17 मुकुंद: जिन के पास निधियाँ है।
18 योगीश्वर: योगियों के ईश्वर या मालिक।
19 गोपेश :गोपियों के मालिक।
20 हरि :दुःखों का हरण करने वाले।
21मदन:सूंदर
22 मनोहर:मन का हरण करने वाले।
23 मोहन:सम्मोहित करने वाले।
24जगदीश:जगत के मालिक।
25 पालनहार:सब का पालन पोषण करने वाले।
26 कंसारी:कंस के शत्रु।
27 रुख्मीनि वलभ:रुक्मणी के पति
28 केशव: केशी नाम दैत्य को मारने वाले. या पानी के उपर निवास करने वाले या जिन के बाल सुंदर है।
29 वासुदेव:वसुदेव के पुत्र होने के कारन।
30रणछोर:युद्ध भूमि स भागने वाले।
31 गुड़ाकेश: निद्रा को जितने वाले।
32 हृषिकेश: इन्द्रियों को जितने वाले।
33 सारथी: अर्जुन का रथ चलने के कारण।
34 दुर्योधन: जिन की रणनिति बहुत ही कठिन है ऐसे कृष्ण भगवान् ( दुतवाक्यम्)
35 पूर्ण परब्रह्म::देवताओ के भी मालिक।
36 देवेश: देवों के भी ईश।
37 नाग नथिया: कलियाँ नाग को मारने के कारण।
38 वृष्णिपति: इस कुल में उतपन्न होने के कारण
39 यदुपति:यादवों के मालिक।
40 यदुवंशी: यदु वंश में अवतार धारण करने के कारण।
41: द्वारकाधीश:द्वारका नगरी के मालिक।
42: नागर:सुंदर।
43 छलिया:छल करने वाले।
44 मथुरा गोकुल वासी:इन स्थानों पर निवास करने के कारण।
45 रमण: सदा अपने आनंद में लीन रहने वाले।
46 दामोदर: पेट पर जिन के रस्सी बांध दी गयी थी।
47 अघहारी: पापों का हरण करने वाले।
48 सखा: अर्जुन और सुदामा के साथ मित्रता निभाने के कारण।
49 रास रचिया: रास रचाने के कारण।
50 अच्युत: जिस के धाम से कोई वापिस नही आता है।
51 नन्द लाला:नन्द के पुत्र होने के कारण।

न्तसमयमें कोई अपने पुत्र आदिके रूपमें भी ‘नारायण’, ‘वासुदेव’ आदि नाम लेता है



प्रश्नअन्तसमयमें कोई अपने पुत्र आदिके रूपमें भी नारायण’, ‘वासुदेवआदि नाम लेता है तो उसको भगवान् अपना ही नाम मान लेते हैं; ऐसा क्यों ?
उत्तरभगवान् बहुत दयालु हैं । उन्होंने यह विशेष छूट दी है कि अगर मनुष्य अन्तसमयमें किसी भी बहाने भगवान्‌का नाम ले ले, उनको याद कर ले तो उसका कल्याण हो जायगा । ......तात्पर्य है कि मनुष्यको रात-दिन, खाते-पीते, सोते-जागते, चलते-फिरते, सब समय भगवान्‌का नाम लेते ही रहना चाहिये । मूर्ति-पूजा और नाम-जपकी महिमापुस्तकसे




वासुदेवपरा वेदा वासुदेवपरा मखाः
वासुदेवपरा योगा वासुदेवपरा क्रियाः
वासुदेवपरं ज्ञानं वासुदेवपरं तपः
वासुदेवपरो धर्मों वासुदेवपरा गतिः …….
अर्थ शास्त्रो मे ज्ञान का परम उद्देश भगवान श्री कृष्ण है । यज्ञ करने का उद्देश उन्हे ही प्रसन करना है । योग उन्ही के साक्षात्कार के लिए है । सारे सकाम कर्म उन्ही के द्वारा पुरस्कृत होते है । वे परम ज्ञान है ओर सारी कठिन त्पस्याय उन्ही को जानने के लिए की जाती है । उनकी प्रेमपूर्ण सेवा करना ही धर्म है । वे ही जीवन के चरम लक्ष्य है । ------------- श्री मद भागवतम , २ -२९"