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Tuesday, 24 November 2015

अपने साधनों के अनुसार अर्चाविग्रह की पूजा करने से चूकना नहीं चाहिए ।


भगवद्गीता गीता में कहा गया है कि यदि कोई भक्त भगवान् को पत्ती या थोड़ा जल भी अर्पित करे तो वे प्रसन्न हो जाते हैं ।
भगवान् द्वारा बताया गया यह सूत्र निर्धन से निर्धन व्यक्ति पर लागू होता है।
किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि जिनके पास पर्याप्त साधन हों वह भी इसी विधि को अपनाए और भगवान्  को जल तथा पत्ती अर्पित करके उन्हें प्रसन्न करने का प्रयत्न करे। यदि उसके  पास पर्याप्त साधन हों तो उसे अच्छे अच्छे अलंकरण,  उत्तम फूल तथा भोज्य सामग्री अर्पित करनी चाहिए और सारे उत्सव मनाने चाहिए ।
  ऐसा नहीं है कि वह अपनी  इन्द्रियतृप्ति के लिए अपना सारा धन व्यय कर दे और भगवान् को प्रसन्न करने के लिए थोड़ा जल तथा पत्ती अर्पित करे ।
कृष्ण को पहले अर्पित किये बिना कोई भी भोज्य पदार्थ नही खाना चाहिए ।
ऋतु के अनुसार कृष्ण को ताजे फल तथा अन्न अर्पित करने से चूकना नहीं चाहिए ।
भोजन बन जाने के बाद, जब तक उसे अर्चाविग्रह को अर्पित न कर दिया जाए तब तक उसे किसी  को नही देना चाहिए ।

Tuesday, 6 October 2015

न्तसमयमें कोई अपने पुत्र आदिके रूपमें भी ‘नारायण’, ‘वासुदेव’ आदि नाम लेता है



प्रश्नअन्तसमयमें कोई अपने पुत्र आदिके रूपमें भी नारायण’, ‘वासुदेवआदि नाम लेता है तो उसको भगवान् अपना ही नाम मान लेते हैं; ऐसा क्यों ?
उत्तरभगवान् बहुत दयालु हैं । उन्होंने यह विशेष छूट दी है कि अगर मनुष्य अन्तसमयमें किसी भी बहाने भगवान्‌का नाम ले ले, उनको याद कर ले तो उसका कल्याण हो जायगा । ......तात्पर्य है कि मनुष्यको रात-दिन, खाते-पीते, सोते-जागते, चलते-फिरते, सब समय भगवान्‌का नाम लेते ही रहना चाहिये । मूर्ति-पूजा और नाम-जपकी महिमापुस्तकसे




वासुदेवपरा वेदा वासुदेवपरा मखाः
वासुदेवपरा योगा वासुदेवपरा क्रियाः
वासुदेवपरं ज्ञानं वासुदेवपरं तपः
वासुदेवपरो धर्मों वासुदेवपरा गतिः …….
अर्थ शास्त्रो मे ज्ञान का परम उद्देश भगवान श्री कृष्ण है । यज्ञ करने का उद्देश उन्हे ही प्रसन करना है । योग उन्ही के साक्षात्कार के लिए है । सारे सकाम कर्म उन्ही के द्वारा पुरस्कृत होते है । वे परम ज्ञान है ओर सारी कठिन त्पस्याय उन्ही को जानने के लिए की जाती है । उनकी प्रेमपूर्ण सेवा करना ही धर्म है । वे ही जीवन के चरम लक्ष्य है । ------------- श्री मद भागवतम , २ -२९"