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Sunday, 24 January 2016

कृष्ण लीला ( जब कान्हा के दर्शन को व्याकुल हुई गोमाता )

भगवान श्रीकृष्ण को गायों से बहुत अधिक प्रेम व लगाव था.
गोकुल में गायों का जन्म भी उनके अनेक जन्मों के पुण्य का परिणाम था.
वे कितनी भाग्यशाली थी कि उन्हें श्रीकृष्ण का पुचकार भरा प्रेम मिलता था. बालक
श्रीकृष्ण उन गायों को अपने कोमल हाथों से सहलाते थे. अपने वस्त्र से ही उन गायों की धूल साफ़ करते. उनका गऊ प्रेम देखते ही बनता था. उन गायों को भी बालक श्रीकृष्ण को देखे बिना चैन नही मिलता था.

भोर होते ही श्रीकृष्ण के दर्शन की लालसा से नन्दभवन के मुख्य दरवाजे की तरफ़ टकटकी लगाये देखा करती. ताकि श्रीकृष्ण के दर्शन कर तृप्त हो सकें. जब भी बालक श्रीकृष्ण नन्दभवन से निकलकर गोशाला में जाते गाय उनके शरीर को अपनी जीभ से चाट-चाटकर अपना सम्पूर्ण वात्सल्य उनके ऊपर उड़ेलती रहती.

यह गोकुल की गाय मईया यशोदा से कम भाग्यशाली नही थी क्योंकि उन्हें भी बालक कृष्ण को अपना दूध पिलाने का अवसर जो प्राप्त हो रहा था और बदले में उन्हें कान्हा का असीम स्नेह मिल रहा था. कान्हा सभी गायों को अपनी माँ की भाँति प्रेम करते थे. इसीलिये जैसे ही उन्हें मौका मिलता उनके पास चले जाते और उनके साथ खूब लाड़ लड़ाते.

एक दिन भोर होते ही कान्हा नन्दभवन से निकलकर सीधा गोशाला में पहुँच गये. वहाँ पर एक गाय उन्हें अपना दूध पिलाने के लिये उनकी प्रतिक्षा कर रही थी.

वात्सल्य-स्नेह से उस गाय का दूध अपने आप झरता जा रहा था. वह वात्सल्य वश व बालक श्रीकृष्ण के दर्शन के हेतु एकटक दृष्टि नन्दभवन दरवाजे पर लगाये थी कि कब कान्हा बाहर निकले और वह उन्हें अपना दूध पिलाकर अपना जीवन सार्थक कर सके. अब कान्हा भी उसके पवित्र प्रेम की उपेक्षा भला कैसे करते !
वह नन्द भवन से निकलकर गोशाला में सीधे उस गाय के पास पहुँचे और उसके थन में मुँह लगाकर लगे उसका दूध पीने लगे. इधर कान्हा तो दुग्धपान का आनन्द ले रहे थे.
वहाँ नन्दभवन में मईया यशोदा बालक कृष्ण को ढूंढ़ कर परेशान हो रही थी. मईया यशोदा जी कन्हा को चारों तरफ़ देख रही थीं.
वे बार-बार कान्हा..कान्हा करके कान्हा को पुकार रही थीं. कान्हा ! ओ कान्हा! तू कहाँ गया, अरे जल्दी से आ भी जा! मैं कब से तेरी प्रतीक्षा कर रही हूँ, लेकिन जब कन्हा होता तब न सुनता, वह तो अपनी गाय माँ का दूध पी रहा था. माता यशोदा उसे पुकारती हुई सोच रही थी, पता नही कन्हैया कहाँ चला गया. उसने अभी तक कलेवा (सुबह का भोजन) भी नही किया है.
थक हारकर उन्होंने बालक कृष्ण को बाहर ढूंढ़ना शुरु किया.

उन्होंने खिड़की से बाहर झांककर देखा, तो चकित होकर देखती ही रह गई.
कान्हा तो अपनी गोमाता के थन में मुँह लगाकर दूध पी रहा है.
गाय प्रेम व वात्सल्य से कन्हैया का सिर चाट रही है.
यशोदा मैया ने कहा कि - हे गोमाता ! तू धन्य है !
मैं तो अभी तक अपने कान्हा के कलेवा की चिन्ता कर रही थी
और तूने तो उसे दूध भी पिला दिया. मैं तुम्हें शत-शत नमन करती हूँ.
क्रमश:……………
यहाँ कान्हा की अदभुत गौ प्रेम की लीला का अद्भुत और विलक्षण द्रश्य है,
हे कृष्णा....

Wednesday, 28 October 2015

कृष्ण सूर्यप्रकाश के तुल्य है



कृष्ण सूर्यप्रकाश के तुल्य है और जहाँ भी कृष्ण रहते है वहाँ अंधकार रुपी माया नहीँ रह सकती । जब कृष्ण को वसुदेव ले जा रहे थे , तब रात्रि का अंधकार दूर हो गया । कारागार के बंधन स्वयमेव खुल गये ।
जब वसुदेव ने कृष्ण को मस्तक पर पधराया तो सारे बंधन टूट गये ।
किन्तु जब गोकुल से कन्या यानी माया को ले आये तो पुनः बन्धनयुक्त हो गये ..
अतः माया रुपी बंधन से बचने हेतु भगवान श्रीकृष्ण के चरणो को अपने मस्तक पर धारण करना चाहिए
यदि अपना जीवन साथक बनाना चाहते हो तो चीज कभी मत छोड़ो = 1. श्रीराधाजी के चरण ! 2. श्रीबहारजी की शरण !
घरकी शोभा भगवान् से हैं l आपके घरमें जो सबसे अच्छी जगह हो, वहाँ भगवान् को विराजो l आजकल लोग साधारण-सी जगहमें भगवान् को बैठा देते हैं l
भगवान् को मालिक मानो-मेरे घरके मालिक भगवान् हैं l भगवान् ने यह सबकुछ दिया है l जो घरमें सेवक बनकर रहता है, उसका मन नहीँ बिगड़ता l
जिस समय तुम्हें भगवान् की याद आये तो तुम जानो कि भगवान् ने हमारे ऊपर कृपा करके हमारे सिर पर हाथ रखा है । फिर भी यदि तुम उस नाम को छोड़ दोगे तो भगवान् का हाथ अपने ऊपर से हटाना यानि उतारना होगा ।

Sunday, 18 October 2015

भगवान् श्री कृष्ण का प्रेम



" भगवान् श्री कृष्ण का प्रेम पा कर मनुष्य सारी बाह्य वस्तुओं को भूल जाता है। जगत का ख्याल उसे नहीं रहता,यहाँ तक कि सब से प्रिय अपने शरीर को भी भूल जाता है। जब ऐसी अवस्था आवे तब समझना चाहिए कि प्रेम प्राप्त हुआ ।"
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क्या आपको 'कृष्ण' का अर्थ मालूम है? वह जो प्रत्येक व्यक्ति और वस्तु को अपनी और आकर्षित करता है, कृष्ण है| ऐसा आकर्षण जो रोका ही न जा सके! पूरा भागवत यह बताता है कि कृष्ण कितने मंत्रमुग्ध कर देने वाले थे| जब वे रथ में बैठ कर गलियों से गुजरते थे तो लोग मूर्ति की तरह स्तब्ध हो कर उन्हें निहारते रह जाते थे... उनके निकल जाने के बाद भी वे बस वहां खड़े रह जाते थे... गोपियाँ कहती 'जाते जाते वे मेरी नज़रे ही ले गए...'| यानी, ऐसे स्थिति, जब दर्शक और दृश्य एक हो जाए..|
ऐसे बहुत से वृत्तांत हैं... एक गोपी, जो श्रृंगार कर रही थी; कृष्ण के आने की खबर सुनकर, एक ही आंख में प्रसाधन लगे हुए उन्हें देखने दौड़ पड़ी.. दिव्यता अत्यंत आकर्षक है.. (ताकि) हमारा मन तुच्छ बन्धनों से ऊपर उठ सके.. इसीलिए इसे 'मोहन' कहा गया है; मोहन ह्रदय को आकर्षित करता है, मोहित करता है और प्रीति से भर देता है...|

भगवान् कृष्ण की महिमा



श्रीकृष्णाय वयन्नुम: 
भगवान् कृष्ण की महिमा
सच्चिदानन्दरूपाय स्थित्युत्पत्त्यादिहेतवे।
तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयन्नुम:।।
     भले लोगों को शरण देने वाले, सत्, चित् और आनन्द स्वरूप, संसार के सृजन, पालन और संहार के कारण, और आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक तीनों तापों को दूर करनेवाले भगवान् कृष्ण को हम लोग प्रणाम करते हैं।
     मनुष्य जाति के इतिहास में जितने पुरुषों की कथा संसार में विदित है, उनमें सबसे बड़े भगवान् कृष्ण हुए हैं। मनुष्य की शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शक्तियों का जितना ऊँचा विकास उनमें हुआ, उतना किसी दूसरे पुरुष में नहीं हुआ। जैसे विमल ज्ञान और जैसी सात्त्विक नीति का उन्होंने उपदेश किया, वैसा किसी और ने नहीं किया। उनकी महिमा के विषय में मैंने अपना सब अभिप्राय दो श्लोकों में लिख दिया है-
सत्यव्रतौ महात्मानौ भीष्मव्यासौ सुविश्रुतौ।   
उभाभ्याम्पूजित: कृष्ण: साक्षाद्विष्णुरिति ह्यलम्।
माहात्म्यं वासुदेवस्य हरेरद्भुतकर्मण:। 
तमेव शरणं गच्छ यदिश्रेयोऽभिवाञ्छसि।
      अर्थात् जिन भगवान् कृष्ण ने अपने प्रकट होने के समय से अन्तर्धान होने के समय तक साधुओं की रक्षा, दुष्टों का दमन, पाप और धर्म की स्थापना आदि अनेक अद्भुत कर्म किए, उनका माहात्म्य केवल इसी बात से भलीभाँति विदित है कि महाभारत के रचयिता श्री वेदव्यास और भीष्म पितामह, जिनका सत्य का व्रत प्रसिद्ध है और जो दोनों कृष्ण के समकालीन थे, और इसलिये जो उनके गुणों से भलीभाँति परिचित थे, दोनों ही महात्माओं ने भगवान् कृष्ण को साक्षात् विष्णु मानकर पूजा है।
‘सनातनधर्म’  सप्ताहिक वर्ष २, अंक ७, ३० अगस्त १९३४

कृष्ण सबसे अधिक पूजा के योग्य हैं



इस प्रकार उन्होंने समझाया कि हमारे ही लिये कृष्ण सबसे अधिक पूजा के योग्य नहीं हैं, बल्कि ये महापुरुष तो तीनों लोकों से पूजा योग्य हैं।
मैंने बहुत से ज्ञान-वृद्ध पुरुषों की सेवा की है और मैंने उनको इकट्ठा होकर श्रीकृष्ण के बहुत से गुणों का वर्णन करते सुना है और कृष्ण ने जन्म से ही जो-जो अद्भुत कार्य किए हैं, उनको भी मैंने बहुत बार लोगों को कहते सुना है।
हे शिशुपाल! हम कृष्ण की इसलिये पूजा करते हैं कि वे पृथ्वी पर सब प्राणियों को सुख पहुँचाने वाले हैं और उनके यश को, उनकी शूरवीरता को और उनकी जय को समझ करके सत्पुरुषों ने उनको पूजा है, इसलिये हम उनकी पूजा करते हैं।
कृष्ण के पूजनीय होने के दोनों ही कारण हैं, वेद-वेदांग का ज्ञान और सबसे अधिक बल। संसार में ऐसा कौन है जो कृष्ण के समान गुण-सम्पन्न हो। इनमें दानशीलता है, निपुणता है, शास्त्र का ज्ञान है, बल है, नम्रता है, यश है, उत्तम बुद्धि है, विनय है, लक्ष्मी है, धैर्य है, सन्तोष है,हृष्टि-पुष्टि है।
ये सब गुण सदा केशव में पाए जाते हैं। ये आचार्य, पिता, गुरु, अर्घ पाने के योग्य, पूजे हुए और पूजा के योग्य, प्रजा-पालक और लोक-प्रिय हैं। इसलिये हमने इनको पूजा के योग्य माना है।
इसी बात को धर्मराज युधिष्ठिर ने भी कहा था-
  यो वै कामान्न भयान्न लोभन्नान्यकारणात्।
  अन्यायमनुवर्त्तेत स्थिरबुद्धिरलोलुप:।।
   धर्मज्ञो धृतिमान्प्राज्ञ: सर्वभूतेषु केशव:।
   ईश्वर: सर्वभूतानां देवदेव: सनातन:।।

Saturday, 17 October 2015

कोई भी जीव कृष्ण के समान पूर्ण एश्र्वर्यवान नहीं है



॥जय गौर हरि॥
ब्रह्मा, शिव या नारायण सहित कोई भी जीव कृष्ण के समान पूर्ण एश्र्वर्यवान नहीं है | अतः ब्रह्मसंहिता में स्वयं ब्रह्माजी का निर्णय है कि श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं | न तो कोई उनके तुल्य है, न उनसे बढ़कर है | वे आदि स्वामी या भगवान् हैं, गोविन्द रूप में जाने जाते हैं और समस्त कारणों के परम कारण हैं –
ईश्र्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्द विग्रहः |
अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम् ||
“ऐसे अनेक पुरुष हैं जो भगवान् के गुणों से युक्त हैं, किन्तु कृष्ण परम हैं क्योंकि उनसे बढ़कर कोई नहीं है। कृष्ण ही परमपुरुष हैं और उनका शरीर सच्चिदानन्दमय है | कृष्ण ही आदि भगवान् गोविन्द हैं और कारणों के कारण हैं |” (ब्रह्मसंहिता)
मनुष्य को जानना चाहिए कि भगवान कृष्ण ब्रह्मांड के सभी लोकों के परम स्वामी हैं. श्री कृष्ण की भक्ति में लीन होना, उनकी शरण में जाना ही धर्म है, अन्य कोई धर्म नहीं है
समस्त कारणों के परम कारण भगवान श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त करने के लिए सदैव सतत जपिए -
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।