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Wednesday, 22 June 2016

अपराध रहित होकर भगवान् का भजन करो

अशेषसंक्लेशशमं विधत्ते गुणानुवादश्रवणं मुरारेः ।*
*कुतः पुनस्तच्चरणारविन्द परागसेवारतिरात्मलब्धा ॥*
                    (भा. ३/७/१४)
जितने प्रकार के क्लेश होते हैं, वे सब केवल भगवान् का गुणानुवाद श्रवण करने मात्र से शान्त हो जाते हैं । ज्यादा कुछ नहीं कर सकते हो तो कथा सुन लो और अगर भक्ति आ गयी तो फिर कहना ही क्या? संसार का ऐसा कोई कष्ट नहीं है जो भगवान् की भक्ति से दूर न हो जाए । कहीं भगवान के चरणों में रति हो गयी फिर तो क्या कहना? निश्चित रूप से समस्त कष्ट केवल कथा सुनने मात्र से चले जाते हैं ।
*शारीरा मानसा दिव्या वैयासे ये च मानुषाः ।*
*भौतिकाश्च कथं क्लेशा बाधन्ते हरिसंश्रयम् ॥*
                     (भा. ३/२२/३७)
शरीर की जितनी बीमारियाँ हैं, मन के रोग, दैवी-कोप, भौतिक-पंचभूतों के क्लेश, सर्दी-गर्मी या सांसारिक-प्राणियों द्वारा प्राप्त कष्ट, सर्प, सिंह आदि का भय; ये सब भगवान् के आश्रय में रहने वाले पर बाधा नहीं करते ।
लेकिन ध्यान रहे कि कथा एवं हरिनाम निरपराध हो एवं गलती से भी कभी किसी वैष्णव का अपराध ना हो, वैष्णव का अपराध तो सपने में भी नहीं सोचना।
नहीं तो सब बेकार है ।
*न भजति कुमनीषिणां स इज्यां*
*हरिरधनात्मधनप्रियो रसज्ञः ।*
*श्रुतधनकुलकर्मणां मदैर्ये*
*विदधति पापमकिञ्चनेषु सत्सु ॥*
                  (भा. ४/३१/२१)
कोई कितनी भी आराधना कर रहा है, भजन कर रहा है लेकिन अगर अकिञ्चन भक्तों का अपराध करता है तो भगवान् उसके भजन को स्वीकार नहीं करते हैं । एक छोटे-से साधक-भक्त से भी चिढ़ते हो तो तुम्हारा सारा भजन नष्ट; फिर चाहे जप-तप कुछ भी करते रहो, उससे कुछ नहीं होगा क्योंकि भगवान् निर्धनों के धन हैं, गरीबों से प्यार करते हैं ।
मनुष्य भक्तों का वैष्णवों का अपराध क्यों करता है?
मद के कारण । विद्या का मद (ज्यादा पढ़ गया तो छोटे लोगों को मूर्ख समझने लगता है); धन का मद (धन-सम्पत्ति ज्यादा बढ़ गयी तो दीनों का तिरस्कार करता है); अच्छे कुल में जन्म का मद (ऊँचे कुल में जन्म हो गया तो अपने को सर्वश्रेष्ठ समझने लगता है और दीन-हीनों की उपेक्षा करता है); इसी तरह से कोई अच्छा कर्म कर लिया तो उसका मद, त्याग-वैराग्य कर लिया तो उससे मद हो जाता है, सांसारिक वस्तुओं में अहंता-ममता के कारण लोग ज्यादा अपराध करते हैं ।
इसलिए अपराध रहित होकर भगवान् का भजन करो, फिर देखो चमत्कार; किसी भी तरह का संकट, क्लेश तुम्हें बाधा नहीं पहुँचा सकेगा ।
 राधे राधे 

Wednesday, 2 December 2015

भाव

भगवान् उस हृदय में रहते हैं जिस हृदय में भाव योग से सफाई की गयी हो।  
एक बार ब्रह्मा जी ने प्रभु से पूछा कि आप कहाँ रहते हो ? 
कोई कहता है कि भगवान् बैकुण्ठ में रहते हैं और कोई कहता है कि प्रभु धाम में रहते हैं। 

भगवान् उसके हृदय में रहते हैं जिस हृदय में भाव योग से उस हृदय की सफाई की गयी हो। अच्छी भावनाओं से हृदय को बुहारा गया हो। निर्मल मन जन सों मोहि पावा , मोहि कपट छल छिद्र न भावा।  
अगर तुम भगवान् से मिलना चाहते हो तो तुम कहीं मत जाओ। सिर्फ अपने मन को साफ करके सुंदर भावनाओं से सजा दो। प्रभु अपने आप आ जायेंगे। रूप गोस्वामी जी ने भक्ति के 64 अंग बताये हैं, परन्तु इतने अंगों की साधना कौन कर सकेगा ? धाम निवास करने से, भक्त संग करने से, या नाम निष्ठा से 64 अंग पूरे हो जाते हैं। इन सभी क्रियाओं में भाव का होना आवश्यक है। भाव के बिना कोई भी साधन भक्ति नहीं देगा।  
इस शरीर को भगवान् का मन्दिर समझो। चराचर सब भगवान् का निवास स्थल है। तुलसी दास जी ने कहा था कि "तुलसी या संसार में सबसे मिलिये धाय, ना जाने केहि बेष में नारायण मिल जाँय"। सर्वत्र प्रभु को देखो। प्रभु ही अनेक रूपों में हमारे सामने स्थित हैं। हर प्राणी को पवित्र दृष्टि से देखो। हर प्राणी का सम्मान करो। ये ही भगवान् की सच्ची पूजा है।  
पता नहीं किस रूप में प्रभु के दर्शन हो जाँय ? जिन प्रभु की चितवन में इतना चमत्कार है कि जरा सा देखने मात्र से ही अनन्त ब्रह्माण्डों की रचना हो जाती है, उनकी शक्ति का कोई क्या अनुमान लगा सकता है ? भक्त दीवाना होता है और होना भी चाहिए। क्योंकि जो अखिल ब्रह्माण्ड नायक है उसे पाना कोई खेल थोड़े ही है। भक्त न कहीं अच्छा देखता है और न कहीं बुरा देखता है। भक्त सबमें एक तत्व देखता है। भक्त अपना ध्यान केवल प्रभु के श्री चरणों में केंद्रित रखता है।  
अपने इष्ट की स्मृति बनी रहे, इससे बड़ा और कोई साधन नहीं है। श्री भगवान् स्मृति के बिना सब साधन व समस्त कर्म व्यर्थ हैं। श्री भगवान् स्मृति की डोर ऐसी अनंत है कि उससे स्वयं श्री भगवान् बंधे चले आते हैं और फिर कभी नहीं जाते।"

Sunday, 18 October 2015

भगवान् श्री कृष्ण का प्रेम



" भगवान् श्री कृष्ण का प्रेम पा कर मनुष्य सारी बाह्य वस्तुओं को भूल जाता है। जगत का ख्याल उसे नहीं रहता,यहाँ तक कि सब से प्रिय अपने शरीर को भी भूल जाता है। जब ऐसी अवस्था आवे तब समझना चाहिए कि प्रेम प्राप्त हुआ ।"
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क्या आपको 'कृष्ण' का अर्थ मालूम है? वह जो प्रत्येक व्यक्ति और वस्तु को अपनी और आकर्षित करता है, कृष्ण है| ऐसा आकर्षण जो रोका ही न जा सके! पूरा भागवत यह बताता है कि कृष्ण कितने मंत्रमुग्ध कर देने वाले थे| जब वे रथ में बैठ कर गलियों से गुजरते थे तो लोग मूर्ति की तरह स्तब्ध हो कर उन्हें निहारते रह जाते थे... उनके निकल जाने के बाद भी वे बस वहां खड़े रह जाते थे... गोपियाँ कहती 'जाते जाते वे मेरी नज़रे ही ले गए...'| यानी, ऐसे स्थिति, जब दर्शक और दृश्य एक हो जाए..|
ऐसे बहुत से वृत्तांत हैं... एक गोपी, जो श्रृंगार कर रही थी; कृष्ण के आने की खबर सुनकर, एक ही आंख में प्रसाधन लगे हुए उन्हें देखने दौड़ पड़ी.. दिव्यता अत्यंत आकर्षक है.. (ताकि) हमारा मन तुच्छ बन्धनों से ऊपर उठ सके.. इसीलिए इसे 'मोहन' कहा गया है; मोहन ह्रदय को आकर्षित करता है, मोहित करता है और प्रीति से भर देता है...|

भगवान् कृष्ण की महिमा



श्रीकृष्णाय वयन्नुम: 
भगवान् कृष्ण की महिमा
सच्चिदानन्दरूपाय स्थित्युत्पत्त्यादिहेतवे।
तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयन्नुम:।।
     भले लोगों को शरण देने वाले, सत्, चित् और आनन्द स्वरूप, संसार के सृजन, पालन और संहार के कारण, और आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक तीनों तापों को दूर करनेवाले भगवान् कृष्ण को हम लोग प्रणाम करते हैं।
     मनुष्य जाति के इतिहास में जितने पुरुषों की कथा संसार में विदित है, उनमें सबसे बड़े भगवान् कृष्ण हुए हैं। मनुष्य की शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शक्तियों का जितना ऊँचा विकास उनमें हुआ, उतना किसी दूसरे पुरुष में नहीं हुआ। जैसे विमल ज्ञान और जैसी सात्त्विक नीति का उन्होंने उपदेश किया, वैसा किसी और ने नहीं किया। उनकी महिमा के विषय में मैंने अपना सब अभिप्राय दो श्लोकों में लिख दिया है-
सत्यव्रतौ महात्मानौ भीष्मव्यासौ सुविश्रुतौ।   
उभाभ्याम्पूजित: कृष्ण: साक्षाद्विष्णुरिति ह्यलम्।
माहात्म्यं वासुदेवस्य हरेरद्भुतकर्मण:। 
तमेव शरणं गच्छ यदिश्रेयोऽभिवाञ्छसि।
      अर्थात् जिन भगवान् कृष्ण ने अपने प्रकट होने के समय से अन्तर्धान होने के समय तक साधुओं की रक्षा, दुष्टों का दमन, पाप और धर्म की स्थापना आदि अनेक अद्भुत कर्म किए, उनका माहात्म्य केवल इसी बात से भलीभाँति विदित है कि महाभारत के रचयिता श्री वेदव्यास और भीष्म पितामह, जिनका सत्य का व्रत प्रसिद्ध है और जो दोनों कृष्ण के समकालीन थे, और इसलिये जो उनके गुणों से भलीभाँति परिचित थे, दोनों ही महात्माओं ने भगवान् कृष्ण को साक्षात् विष्णु मानकर पूजा है।
सनातनधर्म  सप्ताहिक वर्ष २, अंक ७, ३० अगस्त १९३४

Saturday, 10 October 2015

भगवान् के लिए रोना कैसे आये?????



रोना तब आता है जब हम परमात्मा के लिए अति व्याकुल हो जाएँ।
व्याकुलता आती है तब जब उनके बिना रहा न जाये। 
उनके बिना कब रहा नहीं जायेगा? जब यह एहसास होगा कि संसार में उनके सिवाय मेरा और कोई है ही नहीं। मैं यहाँ नितांत अकेला हूँ। एक वो ही मेरे हैं।
केवल एक भगवान ही अपने तब लगेंगे जब संसार का दूसरा कोई भी व्यक्ति अपना नहीं लगेगा। जब तक संसार में एक भी व्यक्ति में अपनापन है तब तक भगवान् के लिए व्याकुलता आएगी ही नहीं।
"मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो न कोई"
हम लोग इसपे तो ध्यान देते हैं कि "मेरे तो गिरिधर गोपाल" परंतु उसके बाद के शब्द "दूसरो न कोई" पे ध्यान नहीं देते। "दूसरो न कोई" पे ध्यान देना है। इसको धारण करना है जीवन में। तभी गिरिधर गोपाल सच में अपने लगेंगे। 
इसीलिए जब संसार के लोग हमें दुःख दे, अपमान करें, तब इसमें प्रभु की असीम कृपा देखनी चाहिए कि वह हमें स्मरण करा रहे हैं कि संसार में कोई अपना नहीं है। जब तक दूसरों से सुख मिलता रहता है तब तक उनसे अपनापन नहीं छूटता। अपनापन तो दुःख में ही मिट सकता है। जब दुःख आये तब यह याद रखें की संसार में कोई अपना नहीं। ऐसा करना दुःख का सदुपयोग करना है। 
संसारी व्यक्ति तो दुःख का भोग करते हैं। परंतु साधक दुःख का सदुपयोग करते हैं।
  जय जय श्री राधे कृष्णा 
जय जय श्री राधे श्याम

Tuesday, 6 October 2015

भगवान् श्री कृष्ण जी के कुछ नाम और उन के अर्थ:

भगवान् श्री कृष्ण जी के कुछ नाम और उन के अर्थ:
आप सब भी और नाम जोडीये क्रम संख्या डालकर .......
1 कृष्ण : सब को अपनी ओर आकर्षित करने वाला.
2गिरिधर: गिरी: पर्वत ,धर धारण करने वाला। अर्थात गोवर्धन पर्वत को उठाने वाले।
3मुरलीधर: मुरली को धारण करने वाले।
4 पीताम्बर धारी: पीत :पिला, अम्बर:वस्त्र। जिस ने पिले वस्त्रों को धारण किया हुआ है।
5मधुसूदन: मधु नामक दैत्य को मारने वाले।
6 यशोदा या देवकी नंदन: यशोदा और देवकी को खुश करने वाला। या पुत्र
7 गोपाल: गौओं का या पृथ्वी का पालन करने वाला।
8गोविन्द: गौओं का रक्षक।
9 आनंद कंद: आनंद की राशि देंने वाला।
10 कुञ्ज बिहारी:कुंज नामक गली में विहार करने वाला।
11चक्रधारी: जिस ने सुदर्शन चक्र या ज्ञान चक्र या शक्ति चक्र को धारण किया हुआ है
12 श्याम: सांवले रंग वाला
13 माधव: माया के पति।
14 मुरारी:मुर नामक दैत्य के शत्रु।
15 असुरारी:असुरों के शत्रु।
16 बनवारी: वनो में विहार करने वाले।
17 मुकुंद: जिन के पास निधियाँ है।
18 योगीश्वर: योगियों के ईश्वर या मालिक।
19 गोपेश :गोपियों के मालिक।
20 हरि :दुःखों का हरण करने वाले।
21मदन:सूंदर
22 मनोहर:मन का हरण करने वाले।
23 मोहन:सम्मोहित करने वाले।
24जगदीश:जगत के मालिक।
25 पालनहार:सब का पालन पोषण करने वाले।
26 कंसारी:कंस के शत्रु।
27 रुख्मीनि वलभ:रुक्मणी के पति
28 केशव: केशी नाम दैत्य को मारने वाले. या पानी के उपर निवास करने वाले या जिन के बाल सुंदर है।
29 वासुदेव:वसुदेव के पुत्र होने के कारन।
30रणछोर:युद्ध भूमि स भागने वाले।
31 गुड़ाकेश: निद्रा को जितने वाले।
32 हृषिकेश: इन्द्रियों को जितने वाले।
33 सारथी: अर्जुन का रथ चलने के कारण।
34 दुर्योधन: जिन की रणनिति बहुत ही कठिन है ऐसे कृष्ण भगवान् ( दुतवाक्यम्)
35 पूर्ण परब्रह्म::देवताओ के भी मालिक।
36 देवेश: देवों के भी ईश।
37 नाग नथिया: कलियाँ नाग को मारने के कारण।
38 वृष्णिपति: इस कुल में उतपन्न होने के कारण
39 यदुपति:यादवों के मालिक।
40 यदुवंशी: यदु वंश में अवतार धारण करने के कारण।
41: द्वारकाधीश:द्वारका नगरी के मालिक।
42: नागर:सुंदर।
43 छलिया:छल करने वाले।
44 मथुरा गोकुल वासी:इन स्थानों पर निवास करने के कारण।
45 रमण: सदा अपने आनंद में लीन रहने वाले।
46 दामोदर: पेट पर जिन के रस्सी बांध दी गयी थी।
47 अघहारी: पापों का हरण करने वाले।
48 सखा: अर्जुन और सुदामा के साथ मित्रता निभाने के कारण।
49 रास रचिया: रास रचाने के कारण।
50 अच्युत: जिस के धाम से कोई वापिस नही आता है।
51 नन्द लाला:नन्द के पुत्र होने के कारण।