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Sunday, 18 October 2015

भगवान् श्री कृष्ण का प्रेम



" भगवान् श्री कृष्ण का प्रेम पा कर मनुष्य सारी बाह्य वस्तुओं को भूल जाता है। जगत का ख्याल उसे नहीं रहता,यहाँ तक कि सब से प्रिय अपने शरीर को भी भूल जाता है। जब ऐसी अवस्था आवे तब समझना चाहिए कि प्रेम प्राप्त हुआ ।"
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क्या आपको 'कृष्ण' का अर्थ मालूम है? वह जो प्रत्येक व्यक्ति और वस्तु को अपनी और आकर्षित करता है, कृष्ण है| ऐसा आकर्षण जो रोका ही न जा सके! पूरा भागवत यह बताता है कि कृष्ण कितने मंत्रमुग्ध कर देने वाले थे| जब वे रथ में बैठ कर गलियों से गुजरते थे तो लोग मूर्ति की तरह स्तब्ध हो कर उन्हें निहारते रह जाते थे... उनके निकल जाने के बाद भी वे बस वहां खड़े रह जाते थे... गोपियाँ कहती 'जाते जाते वे मेरी नज़रे ही ले गए...'| यानी, ऐसे स्थिति, जब दर्शक और दृश्य एक हो जाए..|
ऐसे बहुत से वृत्तांत हैं... एक गोपी, जो श्रृंगार कर रही थी; कृष्ण के आने की खबर सुनकर, एक ही आंख में प्रसाधन लगे हुए उन्हें देखने दौड़ पड़ी.. दिव्यता अत्यंत आकर्षक है.. (ताकि) हमारा मन तुच्छ बन्धनों से ऊपर उठ सके.. इसीलिए इसे 'मोहन' कहा गया है; मोहन ह्रदय को आकर्षित करता है, मोहित करता है और प्रीति से भर देता है...|

Thursday, 8 October 2015

हमारा मन इधर उधर बहुत जाता है



आशा भरद्वाज जी के सकंलन में से ==हमारा मन इधर उधर बहुत जाता है।
कभी यह देवता ,कभी वह देवी की मन्नते मांगते रहते हैं जबकि यह सभी देवी देवता बिहारी जी के ही अधीन हैं। भगवत गीता में स्पष्ट है की जो देवी देवताओं को पूजता है वह उन के लोक में जाता है परन्तु जो मुझे सीधा भजता है वह जीव मुझ को ही प्राप्त होता है।भला बिहारी जी से भी अधिक कोई सुन्दर है? हम कोटि काम लावण्या बिहारीजी को छोड़ कर अन्य देवताओं के पीछे क्यूँ भागते हैं ?
क्या इनके सुन्दर मुख दर्शन से भी अधिक सुन्दर कोई और हो सकता है?
स्वामी श्री हरि दास जी कहते हैं---हे बिहारी जी ! मेरी तो यह ही कामना है कि मैं आपके इस विचित्र मुख कमल के दर्शन सदा करता रहूँ।,,....... 
कुंजबिहारी श्री हरिदास

Wednesday, 7 October 2015

हमारे श्री ठाकुर जी भगवान श्री कृष्ण जी की महानता के ये गुण ,देखिये ,पढ़िए ,गुनिये



राधे राधे ,,, 
हमारे श्री ठाकुर जी भगवान श्री कृष्ण जी की महानता के ये गुण ,देखिये ,पढ़िए ,गुनिये ,,,,,

१- हृदय की प्रसन्नता: जिसका हृदय जितना प्रसन्न, वह उतना ज्यादा महान होता है । जैसे- श्रीकृष्ण प्रसन्नता की पराकाष्ठा पर हैं । ॠषि का शाप मिला है, यदुवंशी आपस में ही लड़कर मार काट मचा रहे हैं, नष्ट हो रहे हैं, फिर भी श्रीकृष्ण की बंसी बज रही हैं
२=उदारता: श्रीकृष्ण प्रतिदिन सहस्रों गायों का दान करते थे । कुछ न कुछ देते थे । धन और योग्यता तो कईयों के पास होती है, लेकिन देने का सामर्थ्य सबके पास नहीं होता । जिसके पास जितनी उदारता होती है, वह उतना ही महान होता है ।
३-नम्रता: श्रीकृष्ण नम्रता के धनी थे । सुदामा के पैर धो रहे हैं श्रीकृष्ण ! जब उन्होंने देखा कि पैदल चलने से सुदामा के पैरों में काँटें चुभ गये हैं, उन्हें निकालने के लिए उन्होंने रुक्मिणीजी से सुई मँगवायी । सुई लाने में देर हो रही थी तो अपने दाँतों से ही काँटें खींचकर निकाले और सुदामा के पैर धोयेकितनी नम्रता !.युधिष्ठिर आते तो श्रीकृष्ण उठकर खड़े हो जाते थे । पांडवो के संधिदूत बनकर गये और वहाँ से लौटे तब भी उन्होंने युधिष्ठिर को प्रणाम करते हुए कहा: महाराज ! हमने तो कौरवों से संधि करने का प्रयत्न किया, किंतु हम विफल रहे |”ऐसे तो चालबाज लोग और सेठ लोग भी नम्र दिखते हैं | परंतु केवल दिखावटी नम्रता नहीं, हृदय की नम्रता होनी चाहिए । हृदय की नम्रता आपको महान बना देगी ।
४- समता: श्रीकृष्ण तो मानो, समता की मूर्ति थे । महाभारत का इतना बड़ा युद्ध हुआ, फिर भी कहते हैं कि कौरव-पांडवों के युद्ध के समय यदि मेरे मन में पांडवों के प्रति राग न रहा हो और कौरवों के प्रति द्वेष न रहा हो तो मेरी समता के परीक्षार्थ यह बालक जीवित हो जाय | और बालक (परीक्षित) जीवित हो उठा.जय जय श्री राधे ..

Tuesday, 6 October 2015

भगवान् श्री कृष्ण जी के कुछ नाम और उन के अर्थ:

भगवान् श्री कृष्ण जी के कुछ नाम और उन के अर्थ:
आप सब भी और नाम जोडीये क्रम संख्या डालकर .......
1 कृष्ण : सब को अपनी ओर आकर्षित करने वाला.
2गिरिधर: गिरी: पर्वत ,धर धारण करने वाला। अर्थात गोवर्धन पर्वत को उठाने वाले।
3मुरलीधर: मुरली को धारण करने वाले।
4 पीताम्बर धारी: पीत :पिला, अम्बर:वस्त्र। जिस ने पिले वस्त्रों को धारण किया हुआ है।
5मधुसूदन: मधु नामक दैत्य को मारने वाले।
6 यशोदा या देवकी नंदन: यशोदा और देवकी को खुश करने वाला। या पुत्र
7 गोपाल: गौओं का या पृथ्वी का पालन करने वाला।
8गोविन्द: गौओं का रक्षक।
9 आनंद कंद: आनंद की राशि देंने वाला।
10 कुञ्ज बिहारी:कुंज नामक गली में विहार करने वाला।
11चक्रधारी: जिस ने सुदर्शन चक्र या ज्ञान चक्र या शक्ति चक्र को धारण किया हुआ है
12 श्याम: सांवले रंग वाला
13 माधव: माया के पति।
14 मुरारी:मुर नामक दैत्य के शत्रु।
15 असुरारी:असुरों के शत्रु।
16 बनवारी: वनो में विहार करने वाले।
17 मुकुंद: जिन के पास निधियाँ है।
18 योगीश्वर: योगियों के ईश्वर या मालिक।
19 गोपेश :गोपियों के मालिक।
20 हरि :दुःखों का हरण करने वाले।
21मदन:सूंदर
22 मनोहर:मन का हरण करने वाले।
23 मोहन:सम्मोहित करने वाले।
24जगदीश:जगत के मालिक।
25 पालनहार:सब का पालन पोषण करने वाले।
26 कंसारी:कंस के शत्रु।
27 रुख्मीनि वलभ:रुक्मणी के पति
28 केशव: केशी नाम दैत्य को मारने वाले. या पानी के उपर निवास करने वाले या जिन के बाल सुंदर है।
29 वासुदेव:वसुदेव के पुत्र होने के कारन।
30रणछोर:युद्ध भूमि स भागने वाले।
31 गुड़ाकेश: निद्रा को जितने वाले।
32 हृषिकेश: इन्द्रियों को जितने वाले।
33 सारथी: अर्जुन का रथ चलने के कारण।
34 दुर्योधन: जिन की रणनिति बहुत ही कठिन है ऐसे कृष्ण भगवान् ( दुतवाक्यम्)
35 पूर्ण परब्रह्म::देवताओ के भी मालिक।
36 देवेश: देवों के भी ईश।
37 नाग नथिया: कलियाँ नाग को मारने के कारण।
38 वृष्णिपति: इस कुल में उतपन्न होने के कारण
39 यदुपति:यादवों के मालिक।
40 यदुवंशी: यदु वंश में अवतार धारण करने के कारण।
41: द्वारकाधीश:द्वारका नगरी के मालिक।
42: नागर:सुंदर।
43 छलिया:छल करने वाले।
44 मथुरा गोकुल वासी:इन स्थानों पर निवास करने के कारण।
45 रमण: सदा अपने आनंद में लीन रहने वाले।
46 दामोदर: पेट पर जिन के रस्सी बांध दी गयी थी।
47 अघहारी: पापों का हरण करने वाले।
48 सखा: अर्जुन और सुदामा के साथ मित्रता निभाने के कारण।
49 रास रचिया: रास रचाने के कारण।
50 अच्युत: जिस के धाम से कोई वापिस नही आता है।
51 नन्द लाला:नन्द के पुत्र होने के कारण।

भक्त हमेशा सभी को भक्ति में ही लगाना चाहता है



बालशुक श्री गोपेश जी...
भक्त हमेशा सभी को भक्ति में ही लगाना चाहता है...संसार में हम देखते है कि यदि परीक्षा में पास होना है तो प्रश्नपत्र के 10 प्रश्नों में से 5 तो हल करना अनिवार्य होता ही है यदि 4 किये तो फेल हो जायेगे,परन्तु भक्ति का प्रश्नपत्र भगवान ने कितना सरल कर दिया, भगवान शबरी जी से कह रहे है है...."नवम सरल सब सं छलहीना,मम भरोस हियँहर्ष न दीना |
नव महूँ एकउ जिन्ह के होई,नारि पुरुष सचराचर कोई"||
अर्थात -भगवान कह रहे है मेरी नौ प्रकार की भक्ति है और नवो में से यदि किसी में एक भी होती है तो वह मुझे अत्यंत प्रिय है..../कोई यदि 9 में से 1 का ही हल कर ले तो पास हो जायेगा.

गोपिया कहती है- कि हमारे पति लोग धूर्त है..जो श्री कृष्ण को नहीं पा सके



गोपी भाव
गोपिया कहती है- " कि हमारे पति लोग धूर्त है..जो श्री कृष्ण को नहीं पा सके ।
एक तो ये अर्थ है दूसरा अर्थ ये है..कि जैसा तू धूर्त है वैसी ही हम धूर्त है...जो तेरी शरण में आई है ।हम धूर्त है क्योंकि हम सब छोड़ के तेरे पास आई...कृष्ण धूर्त कैसे हैं ?? इस पर कहती हैं...हे कृष्ण ! तुम माखन चोर हो माखन चोर ही नहीं.. तुमचित चोर भी हो..चित चोर ही नहीं,,
पाप चोर भी हो..भक्तों के पाप चुरा लेते हो.. और पता नहीं तुम क्या-क्या हो ?? और चोरी बिना धूर्तता के नहीं होती इसलिए तुम धूर्त हो । सबसे बड़े चोर रोज रोज माखन खा जाते थे ,गोपियों का तो.. गोपियों ने पंचायत बुलाई... तो
एक गोपी बोली मेरा भी नाम नहीं अगर कृष्ण को पकड के नहीं दिखाया....कई दिनों तक पीछा करती रही ।
और एक दिन दांव लगा, भीतर घुस करके पहले तो श्री कृष्ण ने दही खाया ।बड़ा मीठा- मीठा !...फिर माखन खाने लगे..तो बस उसी समय पकड़ ली उनकी और कहा अब तो मानो चोर हो ।गोपाल सहस्रनाम में पार्वती जी से शिवजी कहते है कि हे देवी हमारा इष्ट कौन है ??जो कामनी लम्पट है... और सब से ऊँचा चोर है...ऐसा कोई और चोर नहीं हुआ !!
राधे राधे