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Sunday, 18 October 2015

भगवान् कृष्ण की महिमा



श्रीकृष्णाय वयन्नुम: 
भगवान् कृष्ण की महिमा
सच्चिदानन्दरूपाय स्थित्युत्पत्त्यादिहेतवे।
तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयन्नुम:।।
     भले लोगों को शरण देने वाले, सत्, चित् और आनन्द स्वरूप, संसार के सृजन, पालन और संहार के कारण, और आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक तीनों तापों को दूर करनेवाले भगवान् कृष्ण को हम लोग प्रणाम करते हैं।
     मनुष्य जाति के इतिहास में जितने पुरुषों की कथा संसार में विदित है, उनमें सबसे बड़े भगवान् कृष्ण हुए हैं। मनुष्य की शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शक्तियों का जितना ऊँचा विकास उनमें हुआ, उतना किसी दूसरे पुरुष में नहीं हुआ। जैसे विमल ज्ञान और जैसी सात्त्विक नीति का उन्होंने उपदेश किया, वैसा किसी और ने नहीं किया। उनकी महिमा के विषय में मैंने अपना सब अभिप्राय दो श्लोकों में लिख दिया है-
सत्यव्रतौ महात्मानौ भीष्मव्यासौ सुविश्रुतौ।   
उभाभ्याम्पूजित: कृष्ण: साक्षाद्विष्णुरिति ह्यलम्।
माहात्म्यं वासुदेवस्य हरेरद्भुतकर्मण:। 
तमेव शरणं गच्छ यदिश्रेयोऽभिवाञ्छसि।
      अर्थात् जिन भगवान् कृष्ण ने अपने प्रकट होने के समय से अन्तर्धान होने के समय तक साधुओं की रक्षा, दुष्टों का दमन, पाप और धर्म की स्थापना आदि अनेक अद्भुत कर्म किए, उनका माहात्म्य केवल इसी बात से भलीभाँति विदित है कि महाभारत के रचयिता श्री वेदव्यास और भीष्म पितामह, जिनका सत्य का व्रत प्रसिद्ध है और जो दोनों कृष्ण के समकालीन थे, और इसलिये जो उनके गुणों से भलीभाँति परिचित थे, दोनों ही महात्माओं ने भगवान् कृष्ण को साक्षात् विष्णु मानकर पूजा है।
सनातनधर्म  सप्ताहिक वर्ष २, अंक ७, ३० अगस्त १९३४

Tuesday, 13 October 2015

ब्रज की छाछ की महिमा

 एक बार जब भगवान श्री कृष्ण लीला कर रहे तो ब्रह्मा शिव इंद्र इत्यादि सब देवता ठाकुर जी के निकट आये क्या देखा कि ठाकुर जी अपने पीछे कुछ छुपा रहे है !
तब देवता बोले -प्रभु आप क्या छुपा रहे हो ?
भगवान चुपचाप खड़े रहे हाथ में एक पात्र रखा है और उसको पीछे छुपा रखा है !देवताओ ने फिर पूछा -
प्रभु आप क्या छुपा रहे हो तो भगवान धीरे से बोले - देखो आप किसी को बताना नहीं ये जो पात्र है ना इसमें बड़ी मुश्किल से आज मैं कहीं से छाछ लेकर आया हूँ !
देवता बोले -फिर प्रभु छुपा क्यों रहे हो क्या ये बहुत कीमती है ?भगवान बोले -अब इसकी कीमत मैं क्या बताऊँ ?
तो देवता बोले -प्रभु आप जो अनंत कोटि ब्रम्हाण्ड नायक है आप इस छाछ को छुपा रहे है तो ये तो अनमोल होगी तो प्यारे एक घूंट हमे भी मिल जाये आप कृपा कर दो ताकि एक घूंट हम भी पी सके !
भगवान बोले -नहीं-२ देवताओ ये छाछ तुम्हारे सौभागय में नहीं है तुम स्वर्ग का अमृत पी सकते हो पर ब्रजवासियो की छाछ तो मैं ही पियूँगा तुम जाओ यहाँ से स्वर्ग का अमृत पीओ पर ये छाछ मैं आपको नहीं दे सकता हूँ !
देवता बोले -प्रभु ऐसी कौन सी अनमोल बात है इस छाछ में जो हम नहीं पी सकते है आप कह रहे हो कि हम अमृत पिये तो क्या ये छाछ अमृत से भी बढ़कर है ?
अरे छाछ तो छाछ है इसमें क्या बड़ी बात है !
इतना सुना तो ठाकुर जी आँखों में आँसू भरकर बोले - देवताओ तुम्हे नहीं पता इस छाछ को पाने के लिये मुझे गोपिन के सामने नृत्य करना पड़ा है जब मैं नाचा हूँ तब मुझे ये छाछ मिला है :
की ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भर छाछ पर नाच नचावे !
तो कुछ तो बात होगी ही ना गोपियों के प्रेमवश बनाये इस छाछ में में जो इसे पाने के लिये ठाकुर जी को नाचना पड़ा वस्तुतः भक्त के निःस्वार्थ ह्रदय की गहराईयों से निसृत भजन ही भगवान का भोजन है
परमात्मा इसे ही प्रेमवश भोग लगाया करते है !
!! जय जय श्री राधे!!