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Tuesday, 24 November 2015

अपने साधनों के अनुसार अर्चाविग्रह की पूजा करने से चूकना नहीं चाहिए ।


भगवद्गीता गीता में कहा गया है कि यदि कोई भक्त भगवान् को पत्ती या थोड़ा जल भी अर्पित करे तो वे प्रसन्न हो जाते हैं ।
भगवान् द्वारा बताया गया यह सूत्र निर्धन से निर्धन व्यक्ति पर लागू होता है।
किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि जिनके पास पर्याप्त साधन हों वह भी इसी विधि को अपनाए और भगवान्  को जल तथा पत्ती अर्पित करके उन्हें प्रसन्न करने का प्रयत्न करे। यदि उसके  पास पर्याप्त साधन हों तो उसे अच्छे अच्छे अलंकरण,  उत्तम फूल तथा भोज्य सामग्री अर्पित करनी चाहिए और सारे उत्सव मनाने चाहिए ।
  ऐसा नहीं है कि वह अपनी  इन्द्रियतृप्ति के लिए अपना सारा धन व्यय कर दे और भगवान् को प्रसन्न करने के लिए थोड़ा जल तथा पत्ती अर्पित करे ।
कृष्ण को पहले अर्पित किये बिना कोई भी भोज्य पदार्थ नही खाना चाहिए ।
ऋतु के अनुसार कृष्ण को ताजे फल तथा अन्न अर्पित करने से चूकना नहीं चाहिए ।
भोजन बन जाने के बाद, जब तक उसे अर्चाविग्रह को अर्पित न कर दिया जाए तब तक उसे किसी  को नही देना चाहिए ।

Sunday, 18 October 2015

कृष्ण सबसे अधिक पूजा के योग्य हैं



इस प्रकार उन्होंने समझाया कि हमारे ही लिये कृष्ण सबसे अधिक पूजा के योग्य नहीं हैं, बल्कि ये महापुरुष तो तीनों लोकों से पूजा योग्य हैं।
मैंने बहुत से ज्ञान-वृद्ध पुरुषों की सेवा की है और मैंने उनको इकट्ठा होकर श्रीकृष्ण के बहुत से गुणों का वर्णन करते सुना है और कृष्ण ने जन्म से ही जो-जो अद्भुत कार्य किए हैं, उनको भी मैंने बहुत बार लोगों को कहते सुना है।
हे शिशुपाल! हम कृष्ण की इसलिये पूजा करते हैं कि वे पृथ्वी पर सब प्राणियों को सुख पहुँचाने वाले हैं और उनके यश को, उनकी शूरवीरता को और उनकी जय को समझ करके सत्पुरुषों ने उनको पूजा है, इसलिये हम उनकी पूजा करते हैं।
कृष्ण के पूजनीय होने के दोनों ही कारण हैं, वेद-वेदांग का ज्ञान और सबसे अधिक बल। संसार में ऐसा कौन है जो कृष्ण के समान गुण-सम्पन्न हो। इनमें दानशीलता है, निपुणता है, शास्त्र का ज्ञान है, बल है, नम्रता है, यश है, उत्तम बुद्धि है, विनय है, लक्ष्मी है, धैर्य है, सन्तोष है,हृष्टि-पुष्टि है।
ये सब गुण सदा केशव में पाए जाते हैं। ये आचार्य, पिता, गुरु, अर्घ पाने के योग्य, पूजे हुए और पूजा के योग्य, प्रजा-पालक और लोक-प्रिय हैं। इसलिये हमने इनको पूजा के योग्य माना है।
इसी बात को धर्मराज युधिष्ठिर ने भी कहा था-
  यो वै कामान्न भयान्न लोभन्नान्यकारणात्।
  अन्यायमनुवर्त्तेत स्थिरबुद्धिरलोलुप:।।
   धर्मज्ञो धृतिमान्प्राज्ञ: सर्वभूतेषु केशव:।
   ईश्वर: सर्वभूतानां देवदेव: सनातन:।।