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Tuesday, 6 October 2015

मानव जीवन का लक्ष्य केवल एक ही है



मानव जीवन का लक्ष्य केवल एक ही है, हम बस इतना जानना और मानना है
वासुदेव सर्वं इति सब कुछ वासुदेव ही है,
जो अच्छा या पूरा है सब वासुदेव के परम इच्छा है, सब कल्याण कारी है,   
गीता में भगवान कहता भी है
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥
भावार्थ: मैं वासुदेव ही संपूर्ण जगत्‌ की उत्पत्ति का कारण हूँ
और मुझसे ही सब जगत्‌ चेष्टा करता है,
इस प्रकार समझकर श्रद्धा और भक्ति से युक्त बुद्धिमान्‌ भक्तजन
मुझ परमेश्वर को ही निरंतर भजते हैं॥
आगे फिर भी भगवान कहते है      
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
भावार्थ: संपूर्ण धर्मों को अर्थात संपूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझमें त्यागकर
तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान, सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण में आ जा।
मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर॥
भगवान स्पष्ट कह रहे है
मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर
तो भला हम सूफी, फकीरों, कब्रों पर गनाहो की माफ़ी के लिए नाक क्यों रगरे
और जो अच्छा या पूरा है सब वासुदेव के परम इच्छा है, सब कल्याण कारी है,”
तो भला हम सूफी, फकीरों, कब्रों पर फरयाद ले कर मागने क्यों जाये
बस यह जान ले वासुदेव सर्वं इति सब कुछ वासुदेव ही हैतो सब कुछ कल्याण कारी ही होगा
ॐ नमो भगवते कृष्ण वासुदेवाये नमो ; ॐ नमो भगवते कृष्ण वासुदेवाये नमो; ॐ नमो भगवते कृष्ण वासुदेवाये नमो

न्तसमयमें कोई अपने पुत्र आदिके रूपमें भी ‘नारायण’, ‘वासुदेव’ आदि नाम लेता है



प्रश्नअन्तसमयमें कोई अपने पुत्र आदिके रूपमें भी नारायण’, ‘वासुदेवआदि नाम लेता है तो उसको भगवान् अपना ही नाम मान लेते हैं; ऐसा क्यों ?
उत्तरभगवान् बहुत दयालु हैं । उन्होंने यह विशेष छूट दी है कि अगर मनुष्य अन्तसमयमें किसी भी बहाने भगवान्‌का नाम ले ले, उनको याद कर ले तो उसका कल्याण हो जायगा । ......तात्पर्य है कि मनुष्यको रात-दिन, खाते-पीते, सोते-जागते, चलते-फिरते, सब समय भगवान्‌का नाम लेते ही रहना चाहिये । मूर्ति-पूजा और नाम-जपकी महिमापुस्तकसे




वासुदेवपरा वेदा वासुदेवपरा मखाः
वासुदेवपरा योगा वासुदेवपरा क्रियाः
वासुदेवपरं ज्ञानं वासुदेवपरं तपः
वासुदेवपरो धर्मों वासुदेवपरा गतिः …….
अर्थ शास्त्रो मे ज्ञान का परम उद्देश भगवान श्री कृष्ण है । यज्ञ करने का उद्देश उन्हे ही प्रसन करना है । योग उन्ही के साक्षात्कार के लिए है । सारे सकाम कर्म उन्ही के द्वारा पुरस्कृत होते है । वे परम ज्ञान है ओर सारी कठिन त्पस्याय उन्ही को जानने के लिए की जाती है । उनकी प्रेमपूर्ण सेवा करना ही धर्म है । वे ही जीवन के चरम लक्ष्य है । ------------- श्री मद भागवतम , २ -२९"

"वासुदेव सुतं देवम् कंस चानुर मर्दनम् देवकी परमानंदम् कृष्णम् वंदे जगदगुरुम्।।



कृष्ण को नमन- "वासुदेव सुतं देवम् कंस चानुर मर्दनम् देवकी परमानंदम् कृष्णम् वंदे जगदगुरुम्।।"
कृष्ण के जगकल्याणकारी रूप को हम नमन करते हैं। हम योगेश्वर, कर्मयोगी, धर्मरक्षक कृष्ण का वंदन करते हैं।
भागवत् का प्रारंभ भी कृष्ण वंदना से ही हुआ है- "सच्चिदानंद रूपाय, विश्व उत्पत्ति हेतवे, तापत्रय विनाशाय श्रीकृष्ण वयं नुमः।"
परमात्मा श्री कृष्ण का नाम समस्त लोको के लिए मंगल करक है।भगवान श्री कृष्ण वास्तव में पूर्ण ब्रह्म ही हैं। उनमें सारे भूत, भविष्य, वर्तमान के अवतारों का समावेश है। भगवान श्री कृष्ण अनन्त ऐश्वर्य, अनन्त बल, अनन्त यश, अनन्त श्री, अनन्त ज्ञान और अनन्त वैराग्य की जीवन्त मूर्ति हैं। वे कभी विष्णु रूप से लीला करते हैं, कभी नर-नारायण रूप से तो कभी पूर्ण ब्रह्म सनातन रूप से। सारांश ये है कि वे सब कुछ हैं, उनसे अलग कुछ भी नहीं। अपने भक्तों के दुखों का संहार करने के लिये वे समय-समय पर अवतार लेते हैं और अपनी लीलाओं से भक्तों के दुखों को हर लेते हैं। उनका मनोहारी रूप सभी की बाधाओं को दूर कर देता है।
भगवान श्री कृष्ण के नैन इस भव बाधा से पार लगा देते हैं। इसीलिए तो किन्हीं संत ने कहा है: -
मोहन नैना आपके नौका के आकार
जो जन इनमें बस गये हो गये भव से पार