श्री युगल से कुछ मत चाहिये । कुछ भी नहीँ , फिर भी कहे
वें तो उनसे उनके निज धाम के रसिकों की सीत प्रसादी , श्री रसिक किंकरी
प्रसादी का विनय कीजिये ।
कुछ भी नहीँ माँगिये क्योंकि लोहा कभी कुंदन हो नही सकता , रसिक किंकरी वह दिव्य अमृत है जो पारस रूप लोहे को स्वर्ण बना देती है ।
निर्मल रसिक के हृदय में प्रियालाल का अनन्य रस का सार सुख है , जिसे भोगी के भोग बन्धन चिंतन कर ही नहीँ सकते ।
नित
सीत प्रसादी मिल गई तो नित सन्निधि मिल गई । और हम कभी भी ऐसा सुख अपने
प्रयास से नहीँ पा सकते है । जीवन में नित रसिक सीत प्रसादी पाना तो युगल
का आपको ना छोड़ने का प्रण ही है । वह नित रस स्पर्श करते है ... यथा आहार
तथा विहार । रसिक सन्त का आहार युगल अधरामृत है अतः वह सीत प्रसादी भगवत
प्रसादी का सार समेटे हुए है । भगवत प्रसादी सीधे जब भोगी पाता है तो भगवत
अधरामृत का चिंतन नही करता । रसिक प्रसादी में भाव ही अधरामृत का है , अतः
सीत प्रसादी ।
सीत प्रसादी न मिलें तो ब्रज रज की एक
कण पा लीजिये । मात्र एक कण , आंतरिक तृप्ति हेतु । बाह्य रस के लिये
प्राकृत भोग को भगवत अर्पण कर दिव्य प्रसाद रूप अधरामृत रस सक्त पाईये ।
जयजय श्यामाश्याम । तृषित
[19/04, 10:48 PM] +91 94504 57000: श्री राधे
1 राधा मेरे गृह में है,वो ही वन में भी है।वो मेरे पीछे है,वो ही मेरे आगे भी है।मैं उन सर्वव्यापी राधा की वंदना करता हु ।
2
राधा मेरी जिह्वा पे है,राधा मेरे कानों में है,राधा मेरी आँखों में है और
मेरे ह्रदय में भी वो है।सब ओर व्याप्त उन राधा की मैं वंदना करता हु।
3 राधा मेरी पूजा है,राधा मेरा मंत्र जाप है,राधा मेरी हर प्रार्थना में है,राधा मेरे चिंतन में है।मैं उन राधा की वंदना करता हु।
4
मेरा हर गीत राधाजी का ही गुणगान होता है,जो भी मैं पाता हु,वो भी उन्ही
का प्रसाद होता है।जहा भी मैं जाऊ,जहा भी रहु,राधा मुझे याद रहती है।उन
राधाजी की मैं वंदना करता हु।
5 राधा माधुर्य को भी
मधुरता प्रदान करती है।वो महत्ता को भी महत्व प्रदान करती है।उनसे श्रेष्ठ
कोई नही।वो सुंदरता को भी सौंदर्य प्रदान करती है।वो सर्वाधिक सुन्दर
है,अनुपम है,कोई उपमा नहीं।
6 राधा अमृत सिंधु है,सौभाग्य कुसुम है।सारा सौभाग्य एकत्रित हो तब जो सौभाग्य पुष्पित हो वो राधा है।
7
उनका वदन (मुख)कमल(अरविन्द) की तरह है इसलिए उनका नाम कमला भी है।उनकी
उपासना पद्मयोनि ब्रह्माजी भी करते है जो की पद्मनाभ विष्णु जी के नाभि कमल
में प्रकटे है।
वो जब शिशु रूप में पिता वृषभान जी को मिली तब भी वो कमल पर विश्रामवस्था में पधारी थी।
8 राधा का मन प्राण सर्वदा कृष्ण में डूबा या निमज्जित रहता है और कृष्ण का राधा में।राधा ही वृन्दावन की महारानी है।
9
राधनाम सर्वदा मेरी जिह्वाग्र पर होता है।उनका अद्वितीय सुन्दर स्वरूप
मेरी आँखों में रहता है।उनके गुणगान सदा मेरे कानों में गूँजते रहते
है।राधा सदा मेरे मन में विचारो में रहती है।
: 10 जो
सौभाग्यशाली व्यक्ति भगवान् श्री कृष्ण के द्वारा की गई इस स्तुति को
श्रद्धा सहित मनोयोग से पढ़ेगा,वो श्री राधा कृष्ण चरणों में प्रेमपूर्ण
सेवा प्राप्त करेगा।
11 श्रीमति राधिका जी श्री कृष्ण
को निरंतर अपने ह्रदय में धारण करति है,निरंतर प्रेम से उनकी पूजा वंदना
करती है,और श्री कृष्ण राधा जी की।
श्री कृष्ण श्री राधा के ह्रदय को मन को निरन्तर आकर्षित करते है,और श्री राधाजी श्री कृष्ण के ह्रदय को।
जो भी इस प्रार्थना को पढ़ेगा वो निश्चित रूप से युगल चरणों में ऐसी ही अविरल रति प्राप्त करेगा।
जय जय श्री राधे
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