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Tuesday, 1 December 2015

है नाथ मेरी पकड़ डीली है पर आप मुझे थामे रखना आप नहीं छोड़ना

: ततः कृतार्थानां परिणामक्रमसमाप्तिर्गुणानाम्||
धर्ममेघ समाधि( भजन पुष्ट) सिद्ध होने पर साधक के लिए गुणों का कोई कर्त्तव्य बचा नहीं रह जाता|
गुणों का कार्य जो भोग अथवा अपवर्ग देना है,वह पूर्ण हो जाता है|
अतः गुणों के प्रभाव स्वरूप जो परिवर्त्तन होते रहना रूप  परिणामक्रम(continuous change & results)है,वह साधक के लिए पूर्णतः समाप्त हो जाता है|
अतः साधक का भविष्य में कोई शरीर के साथ जन्म होना है,-ऐसी संभावनाएं पूर्णतः समाप्त हो जाती हैं|
यही पुनर्जन्म न होने का विज्ञान(विश्लेषण)है|
अतः जन्ममृत्त्यु के चक्र से छूटने के लिए समग्र पूर्ण मनोयोग से भजन(भगवदाराधन)करते रहिये|
जय श्री कृष्ण||
दास दासानुदास विनोद अरोड़ा
है नाथ मेरी पकड़ डीली है पर आप मुझे थामे रखना आप नहीं छोड़ना मैं आपका हूँ केवल आप ही मेरे है बस यही निश्चय मेरा हर पल बना रहे ।

" सो माया बस भयो गोसाईं, बंध्यो कीर मरकट की नाईं "......!!
हर आदमी की यही शिकायत होती है कि वह अब सब कुछ छोड़कर भगवान का भजन करना चाहता है, पर वह करे तो क्या करे.?
यह संसार उसे छोड़ता ही नहीं है।
जब वह यह कहते है तो मुझे मानस की यही पंक्ति,"सो माया बस भयो गोसाईं, बंध्यों कीर मरकट की नाईं" याद आ जाती है।
हम सभी मानवों की यही हालत है।
जब जीव इस धरती पर आता है तो वह आकाश से गिरने वाली पानी की बूंद की तरह पवित्र, निर्मल और स्वच्छ होता है पर जैसे ही यह पवित्र बूंद धरती का स्पर्श करती है, मटमैली हो जाती है।
उसी प्रकार यह जीव भी जैसे ही धरती का स्पर्श करता है, माया आकर उससे लिपट जाती है, "भूमि परत भा ढाबर पानी, जिम जीवहिं माया लिपटानी" और फिर यह माया जीव से पूरे जीवन भर किसी न किसी रूप में लिपटी ही रहती है।
कभी माँ-बाप के रूप में, कभी प्रेमी -प्रेमिका के रूप में, कभी पत्नी और बच्चों के रूप में, कभी सुन्दरता के रूप में, कभी दानी और त्यागी के रूप में, कभी साधू और सन्यासी होने के अहंकार के रूप, यानि यह माया किसी न किसी रूप में जीव से लिपटी ही रहती है।
जीव नित्य मुक्त है पर माया के आवरण के कारण वह अपने को कीर और मरकट की तरह यह मानता है कि संसार उसे पकडे हुए है।
जब कि वास्तिविकता यही है कि संसार उसे नहीं पकड़े, वही संसार को पकड़े हुए है।
शिकारी तोते {कीर} को पकड़ने के लिए एक रस्सी के ऊपर पोपली [पोला बांस] चढ़ा देता है और नीचे तोते का प्रिय खाद्य मिर्च डाल देता है।
तोता जैसे ही मिर्च के खाने के लालच में पोपली के ऊपर बैठता है, पोपली पलट जाती है और तोता सिर के बल नीचे लटक जाता है।
तोता यह समझता है कि पोपली ने उसे पकड़ लिया है, जब कि वास्तविकता यह है कि वह पोपली को पकड़े हुए है।
वह पोपली को छोड़ दे तो वह नित्य मुक्त है पर वह माया के आवरण के कारण पोपली को छोड़ नहीं पाता और यह काल रूपी शिकारी उसे पकड़ कर अपने साथ ले जाता है।
ठीक यही स्थिति मरकट [बंदर] की होती है।
शिकारी उसको पकड़ने के लिए, एक सकरे मुंह का घड़ा [सुराही], जमीन में गाड़ देता है और उस घड़े में बंदर का प्रिय खाद्य [चने] डाल देता है।
बंदर चने के लालच में घड़े में हाथ डालकर, चने अपनी मुट्टी में भर लेता है।
अब मुट्टी सुराही का मुहं सकरा होने के कारण, निकल नहीं पाती तो वह समझता है कि घड़े ने उसे पकड़ लिया है और तभी काल रूपी शिकारी आकर उसे पकड़ लेता है।
यदि बंदर चनों का लालच छोड़ कर मुट्टी खोल दे तो वह जीव की तरह नित्य मुक्त तो है ही।
इसी माया के आवरण के कारण जीव समझता है कि संसार उसे पकडे हुए है, जबकि वास्तविकता यही है कि जीव संसार को पकडे हुए है।
जीव पुरुषार्थ के द्वारा इस माया के पार नहीं जा सकता।
इसके लिये उसे प्रभु की शरणागति स्वीकार करनी पड़ेगी, तभी वह इस माया के आवरण को भेदने में समर्थ हो सकेगा।
भगवान गीता में स्पष्ट घोषणा कर रहे हैं, "मामेव ये प्रपद्यन्ते, मायामेतां तरन्ति ते" पर हम भगवान को तो मानते है पर भगवान की कही बात पर विश्वास नहीं करते और यही हमारे दुःख का कारण है।
इसके लिए हम ही दोषी हैं, कोई दूसरा नहीं।
श्री राधारंगबिहारी लाल जी प्रिय हों
जय जय श्री राधे

Monday, 2 November 2015

आज दरबार से ख़ाली नहीं जाऊँगी ! हे दयालु ! प्रसन्न हूजिये !

हम सब पर प्रभु कृपा करें ! मंगल ही मंगल हो !

हे कृपामय ! हे करूणा के महासागर प्रभु !
आपके चरणों पर सर रख कर प्रणाम करती हूँ !
आप प्रेम से दया से मेरे सिर पर हाथ फेरिये और अपनी सुखदायी नित्य निरंतर भक्ति का दान दीजिये !
भक्ति बिना आप प्रसन्न नहीं होते ! भक्ति से ही भक्तों के वश में हो जाते है !
जीवन की शाम ढलने से पहले ही भक्ति में सराबोर कर दीजिये !
भक्ति जीवन में आते सब्र संतोष व आनन्द की वर्षा हो जाती है !
पाप दोष सब मिट जाते हैं !
धन्य है भक्त ध्रुव व प्रह्लाद जिन पर बचपन में ही आपने महती कृपा कर भक्ति रस में डुबो दिया !
अब हमारे सब पापों को नज़र अँदाज करके हमें अपनी निश्चिल भक्ति व प्रीति का दान दीजिये !
आज दरबार से ख़ाली नहीं जाऊँगी ! हे दयालु ! प्रसन्न हूजिये !

Saturday, 17 October 2015

प्रभु कहते हैं:- यहाँ कोई किसी का नहीं है



॥जय गौर हरि॥
प्रभु कहते हैं:- यहाँ कोई किसी का नहीं है !ना कोई किसी का भाई है, ना कोई किसी की बहन, ना कोई किसी का पिता है, ना कोई किसी का पुत्र, ये सब रिश्ते नाते, ये ममता, मोह के बंधन, ये शत्रुता के बंधन, ये सब माया का द्रष्टि भ्रम है ! अपने पूर्व जन्मो के अनुसार नये-नये रिश्ते नये-बंधन बनते और बिगड़ते रहते हैं ! सदा केवल रहता है सत्य और भगवान इसलिए भगवान का एक नाम सत्य नारायण भी है.........
पितासि लोकस्य चराचरस्य
त्वमस्य पुज्यश्च गुरुर्गरीयीन्।
न त्वत्समो स्त्यभ्यधिकः कुतोन्यो-
लोकत्रयेप्यप्रतिमप्रभाव ।।
हे प्रभु तुम चराचर जगतके जन्मस्थान हो।
हरिहरादि समस्त देवताओंमे परम देवता हो...वेदोंकोभी पढानेवाले आदिगुरु तुम्ही हो।तुम अप्रतिम,अद्वितीय हो।तेरेसे श्रेष्ठ कहना व्यर्थ हैं क्योंकी ये अनेक ब्रम्हाण्ड जिसमें हैं वो आकाश तुमसे ही उत्पन्न हैं....तब तुम्हारे जैसा कोई और हो ये कहनेमें लज्जा आती हैं।तुम्हारेसे अधिक कोई नही क्योंकी तुम्ही एक हो।
मंदिरमें भगवानके सामने किसीको भी प्रणाम करना भगवानका अपमान हैं।
जय श्री कृष्ण .

Sunday, 11 October 2015

प्रभु के आश्रयसे बढ़कर दूसरा कोई आश्रय नहीं होता है ।


प्रभु की शरणागति का अभिप्राय अपनी सारी चिन्ता को छोड़कर भजन करने से है l
अपने पुरुषार्थ को नहीं छोड़ना चाहिए l
मुख्यतः पंचम् पुरुषार्थ प्रेम को जीवन में लाना चाहिए क्योकि हम सब साक्षात् प्रभु का अंश है
और प्रेम हमारा स्वरूप् है l
जब तक यह हम अपने अंशी भगवान का आश्रय नहीं लेगे तब तक यह दूसरों का आश्रय लेकर पराधीन होते ही रहेगे और दुःख पाते ही रहेगें ।
जबतक मनुष्य भगवान का सहारा नहीं लेगा, तबतक वह दुःख पाता ही रहेगा ।
हम सबका जीवन भी प्रभु भक्ति से प्रकाशित हो यही प्रार्थना है प्रभु के चरणों में