Thursday, 13 April 2017

प्रेम – माधुरी


(ब्रह्मलीन स्वामी श्रीअखण्डानन्द सरस्वतीजी महाराज)
पोस्ट संख्या – ८/११

नन्दनन्दन श्रीकृष्णका प्रेम जिसके चित्तमें उदय होता है, उसके द्वारा कितनी ही उलटी-सीधी चेष्टाएँ होने लगती हैं; क्योंकि इसमें विष और अमृत दोनोंका अपूर्व सम्मिश्रण है । पीड़ा तो इसमें इतनी है कि इसके सामने नये कालकूट विषका गर्व भी खर्व हो जाता है । आनन्दका इतना बड़ा उद्गम है यह प्रेम कि अमृतकी मधुरिमाका अहंकार शिथिल पड़ जाता है । श्रीरूप गोस्वामीने इसका वर्णन करते हुए कहा है –

पीड़ाभिर्नवकालकूटकटुतागर्वस्य निर्वासनो
निष्यन्देन मुदां सुधामधुरिमाहङ्कारसङ्कोचनः ।
प्रेमा सुन्दरी नन्दनन्दनपरो जागर्ति यस्यान्तरे
ज्ञायन्ते स्फुटमस्य वक्रमधुरास्तेनैव विक्रान्तयः ।।

इतना ही नहीं, प्रेमकी गति और भी विलक्षण है । क्योंकि प्रेम तो अपने-आपकी मस्ती है, उसमें किसी दूसरेकी अपेक्षा नहीं है । कोई कुछ भी कहे, सुने, करे, प्रेमी अपने ढंगसे सोचता है । प्रियतमकी स्तुति सुनकर जहाँ प्रसन्न होना चाहिये, वहाँ प्रेमी कभी-कभी उससे तटस्थ हो जाता है; वह सब सुन-सुनकर उसके चित्तमें व्यथा होने लगती है । प्रियतमकी निन्दा सुनकर जहाँ दुःख होना चाहिये, वहाँ प्रेमी सुखका अनुभव करने लगता है – उन बातोंको परिहास समझकर । दोषके कारण उसका प्रेम क्षीण नहीं होता, गुणोंके कारण बढ़ता नहीं; क्योंकि वह तो आठों प्रहर एकरस, एक-सा रहता है । अपनी महिमामें प्रतिष्ठित, अपने स्वरसमें डूबा हुआ नैसर्गिक प्रेम कुछ ऐसा ही होता है – कुछ ऐसी ही उसकी प्रक्रिया है । श्रीरूप गोस्वामीके शब्दोंमें –

स्तोत्रं यत्र तटस्थतां प्रकटयच्चित्तस्य धत्ते व्यथां
निन्दापि प्रमदं प्रयच्छति परीहासश्रियं बिभ्रती ।
दोषेण क्षयितां गुणेन गुरुतां केनाप्यनातन्वती
प्रेम्णः स्वारसिकस्य कस्यचिदियं विक्रीडति प्रक्रिया ।।

ब्रज


जो 4 लीला ब्रज में नित्य है वही 4 लीला वैष्णव के घर में भी नित्य है।
हमारे मन में प्रश्न उठता है की ये 4 लीला वैष्णव की गृह सेवा में कैसे नित्य है?

गृह सेवा में भी ये 4 लीला नित्य है इसका खूब सुन्दर भाव एक ग्रन्थ में बताया गया है।

ऐसा मनोरथ मन में लिए हुए जब हम ठाकुरजी का श्रृंगार करे और अचानक से अपने आप जब श्रृंगार बड़ा हो जाये। ऐसा जब बार बार हो तब मानना की आज श्री ठाकुरजी की मानलीला चल रही है।

ब्रज में 4 लीला नित्य है। मानलीला, दानलीला' रासलीला, गोचारणलीला। ये लीला श्री प्रभु नित्य करते है।

रासलीला----- जब हम सेवा में श्री ठाकुरजी का श्रृंगार करने बैठे हो और याद आये की कुछ वस्तु रह गई। "उस वस्तु को लाने के लिए उठे, उस वस्तु को लाकर फिर बैठे इतने में कुछ और वस्तु लाने की याद आवे फिर उठकर उस वस्तु को लाकर बैठे"। इस तरह बार बार हो तब मानना की आज प्रभु रासलीला कर रहे है और "हलारी" रास चल रहा है।

जब हम ठाकुरजी की सेवा में उपस्थित हो और सेवा में जरा भी मन ना लगे, चित्त की एकाग्रता ना हो तब मानना की ये मन रूपी मटकी प्रभु प्रेम से भराई नही, खाली है इसलिए प्रभु उस खाली मटकी को फोड़ देते है इसलिए श्री ठाकुरजी की सेवा में मन लगता नही।
कभी थोड़ा मन ठाकुरजी की सेवा में लगे और थोड़ा मन लौकिक काम में लगे तब मानना की प्रभु प्रेम से अधूरी मटकी भरी हुई है। अधूरी भरी हुई मटकी को प्रभु ढोल देते है।

दानलीला---- जब श्री प्रभु ने दानलीला करी तब प्रभु ने कुछ मटकी को फोड़ दिया, कुछ मटकी को ढोल दिया और कुछ मटकी प्रभु अपने संग में ले गये।
जब हम ठाकुरजी की सेवा में उपस्थित हो और सेवा में जरा भी मन ना लगे, चित्त की एकाग्रता ना हो तब मानना की ये मन रूपी मटकी प्रभु प्रेम से भराई नही, खाली है इसलिए प्रभु उस खाली मटकी को फोड़ देते है इसलिए श्री ठाकुरजी की सेवा में मन लगता नही।
मटकी गोपीजन का मन है और मटकी में भरा गोरस प्रभु के लिए प्रेम, सर्वात्मभाव है।

मानलीला---- जब अपने घर में कोई वैष्णव आने वाले हो और अपने मन में मनोरथ जगे की-"आज ये वैष्णव आने वाले है तो प्रभु को सुन्दर और भारी श्रृंगार धरु और आने वाले वैष्णव दर्शन करके कहें की- वाह! क्या खूब सुन्दर श्रृंगार हुआ है।"

जब हम सेवा में उपस्थित हो तब कोई लौकिक विचार नही आये, मन कही और ना हो, सभी इन्द्रिया एक साथ श्री ठाकुरजी क़े स्वरूप में लीन हो तब मानना की आज मेरी मन रूपी मटकी रस से पूरी भराई है और प्रभु उस भरी हुई मटकी को अपने संग में ले गये है। जिससे चित्त प्रभु में स्थिर हुआ है।
जब मन रूपी मटकी खाली होगी तो प्रभु उसे फ़ोड़ देंगे, जब मन रूपी मटकी अधूरी होगी तो प्रभु उसे ढोल देंगे और जब मन रूपी मटकी पूरी भरी हुई होगी तो प्रभु उसे अपने संग ले जायेंगे।

गोचारणलीला------ गो यानि हमारी इंद्रियाँ। प्रभु ब्रज में गायो को चराने जाते नही बल्कि हमारी इन्द्रियों जो प्रभु को छोड़कर दूर दूर जा रही है उन इन्द्रियों को घेर घेर कर प्रभु अपने पास लेने जाते है। जब श्री ठाकुरजी से हम दूर हुए हो, विमुख हुए हो तब हमें कोई उत्तम वस्तु देखकर हमे हमारे प्रभु की याद आये की "ये वस्तु तो मेरे प्रभु लायक है" तब मानना की आज प्रभु गोचारणलीला कर रहे है।
🐄श्री कुञ्ज बिहारी श्री हरिदास ।

Thursday, 6 April 2017

एकादशी

संस्कृत शब्द एकादशी का शाब्दिक अर्थ ग्यारह होता है। एकादशी पंद्रह दिवसीय पक्ष (चन्द्र मास) के ग्यारवें दिन आती है। एक चन्द्र मास (शुक्ल पक्ष) में चन्द्रमा अमावस्या से बढ़कर पूर्णिमा तक जाता है, और उसके अगले पक्ष में (कृष्ण पक्ष) वह पूर्णिमा के पूर्ण चन्द्र से घटते हुए अमावस्या तक जाता है। इसलिए हर कैलंडर महीने (सूर्या) में एकादशी दो बार आती है, शुक्ल एकादशी जो कि बढ़ते हुए चन्द्रमा के ग्यारवें दिन आती है, और कृष्ण एकादशी जो कि घटते हुए चन्द्रमा के ग्यारवें दिन आती हैं। ऐसा निर्देश हैं कि हर वैष्णव को एकादशी के दिन व्रत करना चाहियें। इस प्रकार की गई तपस्या भक्तिमयी जीवन के लिए अत्यंत लाभकारी हैं।

एकादशी का उद्गम

पद्मा पुराण के चतुर्दश अध्याय में, क्रिया-सागर सार नामक भाग में, श्रील व्यासदेव एकादशी के उद्गम की व्याख्या जैमिनी ऋषि को इस प्रकार करते हैं :

इस भौतिक जगत के उत्पत्ति के समय, परम पुरुष भगवान् ने, पापियों को दण्डित करने के लिए पाप का मूर्तिमान रूप लिए एक व्यक्तित्व की रचना की (पापपुरुष)। इस व्यक्ति के चारों हाथ पाँव की रचना अनेकों पाप कर्मों से की गयी थी। इस पापपुरुष को नियंत्रित करने के लिए यमराज की उत्पत्ति अनेकों नरकीय ग्रह प्रणालियों की रचना के साथ हुई। वे जीवात्माएं जो अत्यंत पापी होती हैं, उन्हें मृत्युपर्यंत यमराज के पास भेज दिया जाता है, यमराज ,जीव को उसके पापों के भोगों के अनुसार नरक में पीड़ित होने के लिए भेज देते हैं।

इस प्रकार जीवात्मा अपने कर्मों के अनुसार सुख और दुःख भोगने लगी। इतने सारी जीवात्माओं को नरकों में कष्ट भोगते देख परम कृपालु भगवान् को उनके लिए बुरा लगने लगा। उनकी सहायतावश भगवान् ने अपने स्वयं के स्वरुप से, पाक्षिक एकादशी के रूप को अवतरित किया। इस कारण, एकादशी एक चन्द्र पक्ष के पन्द्रवें दिन उपवास करने के व्रत का ही व्यक्तिकरण है । इस कारण एकादशी और भगवान् श्री विष्णु अभिन्न नहीं है। श्री एकादशी व्रत अत्यधिक पुण्य कर्म हैं, जो कि हर लिए गए संकल्पों में शीर्ष स्थान पर स्थित है।

तदुपरांत विभिन्न पाप कर्मी जीवात्माएं एकादशी व्रत का नियम पालन करने लगी और उस कारण उन्हें तुरंत ही वैकुण्ठ धाम की प्राप्ति होने लगी। श्री एकादशी के पालन से हुए अधिरोहण से , पापपुरुष (पाप का मूर्तिमान स्वरुप) को धीरे धीरे दृश्य होने लगा कि अब उसका अस्तित्व ही खतरे में पड़ने लगा है। वह भगवान् श्री विष्णु के पास प्रार्थना करते हुए पहुँचा, “हे प्रभु, मैं आपके द्वारा निर्मित आपकी ही कृति हूँ और मेरे माध्यम से ही आप घोर पाप कर्मों वाले जीवों को अपनी इच्छा से पीड़ित करते हैं। परन्तु अब श्री एकादशी के प्रभाव से अब मेरा ह्रास हो रहा है। आप कृपा करके मेरी रक्षा एकादशी के भय से करें। कोई भी पुण्य कर्म मुझे नहीं बाँध सकता हैं। परन्तु आपके ही स्वरुप में एकादशी मुझे प्रतिरोधित कर रही हैं। मुझे ऐसा कोई स्थान ज्ञात नहीं जहाँ मैं श्री एकादशी के भय से मुक्त रह सकूं। हे मेरे स्वामी! मैं आपकी ही कृति से उत्पन्न हूँ, इसलिए कृपा करके मुझे ऐसे स्थान का पता बताईये जहाँ मैं निर्भीक होकर निवास कर सकूँ।”

तदुपरांत, पापपुरुष की स्थिति पर अवलोकन करते हुए भगवान् श्री विष्णु ने कहा, “हे पापपुरुष! उठो! अब और शोकाकुल मत हो। केवल सुनो, और मैं तुम्हे बताता हूँ कि तुम एकादशी के पवित्र दिन पर कहाँ निवास कर सकते हो। एकादशी का दिन जो त्रिलोक में लाभ देने वाला है, उस दिन तुम अन्न जैसे खाद्य पदार्थ की शरण में जा सकते हो। अब तुम्हारे पास शोकाकुल होने का कोई कारण नहीं है, क्योंकि मेरे ही स्वरुप में श्री एकादशी देवी अब तुम्हे अवरोधित नहीं करेगी।” पापपुरुष को आश्वाशन देने के बाद भगवान श्री विष्णु अंतर्ध्यान हो गए और पापपुरुष पुनः अपने कर्मों को पूरा करने में लग गया। भगवान विष्णु के इस निर्देश के अनुसार, संसार भर में जितने भी पाप कर्म पाए जा सकते हैं वे सब इन खाद्य पदार्थ (अनाज) में निवास करते हैं। इसलिए वे मनुष्य गण जो कि जीवात्मा के आधारभूत लाभ के प्रति सजग होते हैं वे कभी एकादशी के दिन अन्न नहीं ग्रहण करते हैं।

एकादशी व्रत धारण करना

सभी वैदिक शास्त्र एकादशी के दिन पूर्ण रूप से उपवास( निर्जल) करने की दृढ़ता से अनुशंसा करते हैं। आध्यात्मिक प्रगति के लिए आयु आठ से अस्सी तक के हर किसी को वर्ण आश्रम, लिंग भेद या और किसी भौतिक वैचारिकता की अपेक्षा कर के एकादशी के दिन व्रत करने की अनुशंसा की गयी है।

वे लोग जो पूर्ण रूप से उपवास नहीं कर सकते उनके लिए मध्याह्न या संध्या काल में एक बार भोजन करके एकादशी व्रत करने की भी अनुशंसा की गयी हैं। परन्तु इस दिन किसी भी रूप में किसी को भी किसी भी स्थिति में अन्न नहीं ग्रहण करना चाहिये।

एकादशी पर भक्तिमयी सेवा

एकादशी को उसके सभी लाभों के साथ ऐसा उपाय या साधन समझना चाहिये जो सभी जीवों के परम लक्ष्य, भगवद भक्ति, को प्राप्त करने में सहायक हैं । भगवान् की कृपा से यह दिन भगवान् की भक्तिमयी सेवा करने के लिए अति शुभकारी एवं फलदायक बन गया है। पापमयी इच्छाओं से मुक्त हो एक भक्त विशुद्ध भक्तिमयी सेवा कर सकता है और ईश्वर की कृपापात्र बन सकता है।

इसलिए, भक्तों के लिए, एकादशी के दिन व्रत करना साधना-भक्ति के मार्ग में प्रगति करने का माध्यम है। व्रत करने की क्रिया चेतना का शुद्धिकरण करती है और भक्त को कितने ही भौतिक विचारों से मुक्त करती है। क्योंकि इस दिन की गई भक्तिमयी सेवा का लाभ किसी और दिन की गई सेवा से कई गुना अधिक होता है, इसलिए भक्त जितना अधिक से अधिक हो सके आज के दिन जप, कीर्तन, भगवान की लीला संस्मरण पर चर्चाएँ आदि अन्य भक्तिमयी सेवाएं किया करते हैं।

श्रील प्रभुपाद ने भक्तों के लिए इस दिन कम से कम पच्चीस जप माला संख्या पूरी करने, भगवान् के लीला संस्मरणों को पढ़ने एवं भौतिक कार्यकलापों में न्यूनतम संलग्न होने की अनुशंसा की है। हालाँकि, वे भक्त जो पहले से ही भगवान् की भक्ति की सेवाओं( जैसे पुस्तक वितरण, प्रवचन आदि) में सक्रियता से लगे हुए हैं उनके लिए उन्होंने कुछ छूट दी हैं, जैसे उन खाद्यों को वे इस दिन भी खा या पी सकते है जिनमे अन्न नहीं हैं।

एकादशी का महात्म्य

श्रील जीव गोस्वामी द्वारा रचित, भक्ति-सन्दर्भ में स्कन्द पुराण में से लिया हुआ एक श्लोक भर्त्सना करते हुए बताता है कि जो मनुष्य एकादशी के दिन अन्न ग्रहण करते हैं वो मनुष्य अपने माता, पिता, भाइयों एवं अपने गुरु की मृत्यु का दोषी होते हैं, वैसे मनुष्य अगर वैकुंठ धाम तक भी पहुँच जाएँ तो भी वे वहाँ से नीचे गिर जाते हैं। उस दिन किसी भी तरह के अन्न को ग्रहण करना सर्वथा वर्जित है, चाहे वह भगवान् विष्णु को ही क्यों न अर्पित हो।

ब्रह्म-वैवर्त पुराण में कहा गया है कि जो कोई भी एकादशी के दिन व्रत करता है वो सभी पाप कर्मों के दोषों से मुक्त हो जाता हैं और आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करता है। मूल सिद्धांत केवल उस दिन भूखे रहना नहीं है, बल्कि अपनी निष्ठा और प्रेम को गोविन्द, या कृष्ण पर और भी सुदृढ़ करना है। एकादशी के दिन व्रत का मुख्य कारण है अपनी शरीर की जरूरतों को घटाना और अपने समय का भगवान् की सेवा में जप या किसी और सेवा के रूप में व्यय करना है। उपवास के दिन सर्वश्रेष्ठ कार्य तो भगवान् गोविन्द के लीलाओं का ध्यान करना और उनके पावन नामों को निरंतर सुनते रहना है।।

जय श्रीकृष्ण

Saturday, 1 April 2017

सुंदर मार्मिक प्रसंग


एक संत ब्रजमोहनदास जी के पास आया करते थे. श्री रामहरिदास जी, उन्हेंनें पूछाँ कि बाबा लोगों के मुहॅ से हमेशा सुनते आए कि “वृदांवन के वृक्ष को मर्म ना जाने केाय, डाल-डाल और पात-पात श्री राधे राधे होय” तो महाराज क्या वास्तव में ये बात सत्य है.कि वृदावंन का हर वृक्ष राधा-राधा नाम गाता है.
तो ब्रजमोहनदास जी ने कहा - क्या तुम ये सुनना या अनुभव करना चाहते हो ? 

तो श्री रामहरिदास जी ने कहा - कि बाबा! कौन नहीं चाहेगा कि साक्षात अनुभव कर ले. और दर्षन भी हो जाए. आपकी कृपा हो जाए, तो हमें तो एक साथ तीनो मिल जायेगे. तो ब्रजमोहन दास जी ने दिव्य दृष्टिी प्रदान कर दी. और कहा - कि मन में संकल्प करो और देखो और सामने "तमाल का वृक्ष" खडा है उसे देखो, तो रामहरिदास जी ने अपने नेत्र खोले तो क्या देखते है कि उस तमाल के वृक्ष के हर पत्ते पर सुनहरे अक्षरों से राधे-राधे लिखा है उस वृक्ष पर लाखों तो पत्ते है. 

जहाँ जिस पत्ते पर नजर जाती है. उस पर राधे-राधे लिखा है, और जब पत्ते हिलते तो राधे-राधे की ध्वनि हर पत्ते स्व निकल रही है. तो आष्चर्य का ठिकाना नहीं रहा और ब्रजमोहन दास जी के चरणों में गिर पडे और कहा कि बाबा आपकी और राधा जी की कृपा से मैने वृदांवन के वृक्ष का मर्म जान लिया इसको केाई नहीं जान सकता कि वृदांवन के वृक्ष क्या है? ये हम अपनेशब्दों में बयान नहीं कर सकते. ये तो केवल संत ही बता सकता है हम साधारण दृष्टिी से देखते है . जहाँ पर हर डाल, हर पात पर, राधे
श्याम बसते है .

व्रज की महिमा को कहे, को वरने व्रज धाम,
जहा बसत हर सास में श्री राधे ओर श्याम
व्रज रज जकू मिली गई, बकी चाट ना शेष,
व्रज की चाहत में रहे, ब्रह्मा विष्णु महेश

वृदांवन की महिमा केा कौन अपनी एक जुबान से गा सकता है स्वंय शेष जी अपने सहस्त्र मुखों से वृदांवन की महिमा का गुणगान नहीं कर सकते है . जहाँ ब्रज की रज में राधे श्याम बसते है. ब्रज की चाहत तो बह्रमा महेश विष्णु करते है. ब्रज के रस कु जो चखे, चखे ना दूसर स्वाद एक बार राधा कहे, तो रहे ना कुछ ओर याद जिनके रग-रग में बसे श्री राधे ओर श्याम ऐसे व्रज्वासिन कु शत-शत नमन प्रणाम क्येांकि संत को वो वृदांवन दिखता है जो साक्षात गौलोंक धाम का खंड है. 

हमें साधारण वृदांवन दिखता है. क्योकि हमारी द्रष्टि मायिक है,हम संसार कि विषयों में डूबे हुए है,जब किसी संत कि कृपा होती है तभी वे किसी विरले भक्त हो वह दिव्य द्रष्टि देते है जिससे हम उस दिव्य वृंदावन को देख सकते है, और अनुभव कर सकते है कि व्रज का हर पत्ता और हर डाल राधा रानी जी के गुणों का बखान करता है.  
जय श्री राधे

विरह व्यथा


  
    *एक दिन वृंदावन की बाज़ार मैं खडी होके एक सखी कुछ बेच रही है, लोग आते हैं पूछते हैं और हँस कर चले जाते हैं।  वह चिल्ला चिल्ला कर कह रही है कोई तो खरीद लो। पर वो सखी बेच क्या रही है ?? अरे ? यह क्या ? ये तो नींद बेच रही है।* 
  *आखिर नींद कैसे बिक सकती है.? कोई दवा थोडी है। जो कोई भी नींद खरीद ले। सुबह से शाम होने को आई कोई ग्राहक ना मिला। सखी की आस बाकी है कोई तो ग्राहक मिलेगा शाम तक दूर कुछ महिलाऐं बातें करती गाँव मैं जा रहीं हैं वो उस सखी का ही उपहास कर रही है। अरे एक पगली आज सुबह से नींद बेच रही है। भला नींद कोई कैसे बेचेगा। पगला गई है वो ना जाने कौन गाँव की है। पीछे पीछे एक दूसरी सखी बेमन से गाय दुह कर आ रही है। वह ध्यान से उनकी बात सुन रही है। बात पूरी हुई तो सखी ने उन महिलाओ से पूछा कौन छोर पे बेच रही है नींद, पता पाकर दूध वहीं छोड़ उल्टे कदम भाग पडी। अँधेरा सा घिर आया है. पर पगली सी नंगे पैर भागे जा रही है. बाजार पहुंच कर पहली सखी से जा मिली और बोल पडी. अरी सखी ये नींद मुझे दे दे। इसके बदले चाहे तू कुछ भी ले ले पर ये नींद तू मुझे दे दे, मैं तुझसे मोल पूछती ही नही तू कुछ भी मोल लगा पर ये नींद मुझे ही दे दे।*
*अब बात बन रही है, सुबह से खडी सखी को ग्राहक मिल गया है और दूसरी सखी को नींद मिल रही है. अब बात बन भी गई.*
*अब पहली सखी ने पूछा सखी मुझे सुबह से शाम हो गई. लोग मुझे पागल बता के जा रहे हैं तू एक ऐसी भागी आई मेरी नींद खरीदने, ऐसा क्या हुआ ? दूसरी सखी बोली सखी यही मैं तुझसे पूछना चाहती हूँ ऐसा क्या हुआ जो तू नींद बेच रही है।*
*पहली सखी बोली, सखी क्या बताऊं, उसकी याद मैं पल पल भारी है मैने उससे एक बार दर्शन देने को कहा और वो प्यारा श्यामसुंदर राज़ी भी हो गया। उसने दिन भी बताया के मैं अमुक ठिकाने मिलने आऊँगा। पर हाय रे मेरी किस्मत जब से उसने कहा के मैं मिलने आऊगा तब से नींद उड़ गई पर हाय कल ही उसे आना था पर कल ही आँख लग गई। और वो प्यारा आकर चला भी गया। हाय रे मेरी फूटी किस्मत। तभी मैने पक्का किया के इस बैरन, सौतन निन्दिया को बेच कर रहूँगी। मेरे साजन से ना मिलने दिया। अब इसे बेच कर रहूँगी।*
*अब तू बता कि तू इसे खरीदना क्यों चाहती है ?*
*क्या बताऊ सखी, एक नींद मैं ही तो वो प्यारा मुझसे मिलता है. दिन भर काम मैं सास ससुर। घर के काम मैं फ़ुर्सत कहाँ के वो प्यारा श्यामसुंदर  मुझसे मिलने आये. वो केवल ख्वाब मैं ही मिलता था. मैने उससे कहा अब कब मुझे अपने साथ ले चलेगा ? उसने कहा अमुक दिन ले चलूँगा पर उसी दिन से नींद ही उड़ गई। सौतन अंखिया छोड़कर ही भाग गई. अब कहाँ से मिले वो प्यारा ??  हाय कितने ही जतन किये पर ये लौट कर ना आई। अब सखी तू ये नींद मुझे दे दे जिस से मुझे वो प्यारा मिल जाये। पहली सखी बोली. ले जा इस बैरन, सौतन को ताकि मैं सो न सकूँ. और वो प्यारा मुझे मिल सके।*

*भाव देखिये दोनों का भाव एक ही है पर तरीका अलग है*
  *व्रजभक्तो के भाग्य की क्या कहे। व्रजांगनाओके चरणोमें कोटी कोटी वंदन।* 
*बोलिए वृंदावन बिहारी लाल की जय*

*जय जय श्री राधे श्याम*