Saturday, 1 April 2017

विरह व्यथा


  
    *एक दिन वृंदावन की बाज़ार मैं खडी होके एक सखी कुछ बेच रही है, लोग आते हैं पूछते हैं और हँस कर चले जाते हैं।  वह चिल्ला चिल्ला कर कह रही है कोई तो खरीद लो। पर वो सखी बेच क्या रही है ?? अरे ? यह क्या ? ये तो नींद बेच रही है।* 
  *आखिर नींद कैसे बिक सकती है.? कोई दवा थोडी है। जो कोई भी नींद खरीद ले। सुबह से शाम होने को आई कोई ग्राहक ना मिला। सखी की आस बाकी है कोई तो ग्राहक मिलेगा शाम तक दूर कुछ महिलाऐं बातें करती गाँव मैं जा रहीं हैं वो उस सखी का ही उपहास कर रही है। अरे एक पगली आज सुबह से नींद बेच रही है। भला नींद कोई कैसे बेचेगा। पगला गई है वो ना जाने कौन गाँव की है। पीछे पीछे एक दूसरी सखी बेमन से गाय दुह कर आ रही है। वह ध्यान से उनकी बात सुन रही है। बात पूरी हुई तो सखी ने उन महिलाओ से पूछा कौन छोर पे बेच रही है नींद, पता पाकर दूध वहीं छोड़ उल्टे कदम भाग पडी। अँधेरा सा घिर आया है. पर पगली सी नंगे पैर भागे जा रही है. बाजार पहुंच कर पहली सखी से जा मिली और बोल पडी. अरी सखी ये नींद मुझे दे दे। इसके बदले चाहे तू कुछ भी ले ले पर ये नींद तू मुझे दे दे, मैं तुझसे मोल पूछती ही नही तू कुछ भी मोल लगा पर ये नींद मुझे ही दे दे।*
*अब बात बन रही है, सुबह से खडी सखी को ग्राहक मिल गया है और दूसरी सखी को नींद मिल रही है. अब बात बन भी गई.*
*अब पहली सखी ने पूछा सखी मुझे सुबह से शाम हो गई. लोग मुझे पागल बता के जा रहे हैं तू एक ऐसी भागी आई मेरी नींद खरीदने, ऐसा क्या हुआ ? दूसरी सखी बोली सखी यही मैं तुझसे पूछना चाहती हूँ ऐसा क्या हुआ जो तू नींद बेच रही है।*
*पहली सखी बोली, सखी क्या बताऊं, उसकी याद मैं पल पल भारी है मैने उससे एक बार दर्शन देने को कहा और वो प्यारा श्यामसुंदर राज़ी भी हो गया। उसने दिन भी बताया के मैं अमुक ठिकाने मिलने आऊँगा। पर हाय रे मेरी किस्मत जब से उसने कहा के मैं मिलने आऊगा तब से नींद उड़ गई पर हाय कल ही उसे आना था पर कल ही आँख लग गई। और वो प्यारा आकर चला भी गया। हाय रे मेरी फूटी किस्मत। तभी मैने पक्का किया के इस बैरन, सौतन निन्दिया को बेच कर रहूँगी। मेरे साजन से ना मिलने दिया। अब इसे बेच कर रहूँगी।*
*अब तू बता कि तू इसे खरीदना क्यों चाहती है ?*
*क्या बताऊ सखी, एक नींद मैं ही तो वो प्यारा मुझसे मिलता है. दिन भर काम मैं सास ससुर। घर के काम मैं फ़ुर्सत कहाँ के वो प्यारा श्यामसुंदर  मुझसे मिलने आये. वो केवल ख्वाब मैं ही मिलता था. मैने उससे कहा अब कब मुझे अपने साथ ले चलेगा ? उसने कहा अमुक दिन ले चलूँगा पर उसी दिन से नींद ही उड़ गई। सौतन अंखिया छोड़कर ही भाग गई. अब कहाँ से मिले वो प्यारा ??  हाय कितने ही जतन किये पर ये लौट कर ना आई। अब सखी तू ये नींद मुझे दे दे जिस से मुझे वो प्यारा मिल जाये। पहली सखी बोली. ले जा इस बैरन, सौतन को ताकि मैं सो न सकूँ. और वो प्यारा मुझे मिल सके।*

*भाव देखिये दोनों का भाव एक ही है पर तरीका अलग है*
  *व्रजभक्तो के भाग्य की क्या कहे। व्रजांगनाओके चरणोमें कोटी कोटी वंदन।* 
*बोलिए वृंदावन बिहारी लाल की जय*

*जय जय श्री राधे श्याम*

Thursday, 30 March 2017

जो ठाकुर जी को याद करते हैं

जो ठाकुर जी को याद करते हैं ठाकुर जी भी उनको याद करते हैं रोते हैं उनके लिए "

एक व्यक्ति हर रोज मंगला दर्शन अपने नजदीकी मंदिर में करता है और फिर अपने नित्य जीवन कार्य में लग जाता है। कहीं वर्ष तक यह नियम होता रहा।

एक दिन ऐसे ही वह मंदिर पहुँचा तो मंदिर के श्री प्रभु के द्वार बंध पाये। वह आकुल व्याकुल हो गया। अरे ऐसा कैसे हो सकता है?

उसके हिर्दय को खेद पहुंचा। वह नजदीकी ऐक जगह पर बैठ गया। उनकी आँखों से आँसू बहने लगे, और आंतरिक पुकार उठी।

" हे बांके बिहारी जी , हे गिर्वरधारी जी।
     जाए छुपे हो कहाँ, हमरी बारी जी...।।"

बहते आंसू और दिल की बैचेनी ने उन्हें तडपता कर दिया। पूरे तन में विरह की आग जल उठी।

इतने में कहीं से पुकार आयी ओ तुने कहाँ लगायी इती देर अरे ओ बांवरिया! बांवरिया! बांवरिया मेरे प्रिय प्यारा!

वह आसपास देखने लगा, कौन पुकारता है? पर न कोई आस और न कोई पास था। वह इधर उधर देखने लगा, पर न कोई था। वह बैचेन हो कर बेहोश हो गया।

काफी देर हुई, उनके पैर को जल की एक धारा छूने लगी, और वह होश में आ गया। वह सोचने लगा यह जल आया कहां से?

धीरे धीरे उठ कर वह जल के स्त्रोत को ढूंढने लगा तो देखा कि वह स्त्रोत श्री प्रभु के द्वार से आता है।
इतने में फिर से आवाज आई

ओ तुने क्युं लगायी इती देर अरे ओ बांवरिया!

वह सोच में पड गया! यह क्या! यह कौन पुकारता है? यहाँ न कोई है? तो यह पुकार कैसी?

वह फूट फूट कर रोने लगा।
कहने लगा - प्रभु! ओ प्रभु! और फिर से बेहोश हो गया।

बेहोशी में उन्होंने श्री ठाकुर जी के दर्शन पाये और उनकी रूप माधुरी को निहारकर आनंद पाने लगा। उनके चेहरे की आभा तेज होने लगी।

इतने में मंदिर में आरती का शंख बजा।आये हूऐ दर्शनार्थी ने उन्हें जगाया।

उन्होंने श्री ठाकुर जी के जो दर्शन मंदिर में पाये। ओहहह! वहीं दर्शन थे जो उन्हें बेहोशी में हुए था।

इतने में उनकी नजर श्रीप्रभु के नयनों पर पहुंची, और वह स्थिर हो गया। श्रीप्रभु के नयनों में आंसू! ओहहह! वह अति गहराई में जा पहुँचा।।।।

ओहहह! जो जल मुझे स्पर्श किया था वह श्रीप्रभु के अश्रु! .....   नहीं नहीं! मुझसे यह क्या हो गया? श्रीप्रभु को कष्ट! वह बहुत रोया और बार बार क्षमा माँगने लगा।

 श्रीप्रभु ने मुस्कराते दर्शन से कहा, तुने कयुं करदी देर? अरे अब पल की भी न करना देर ओ मेरे बांवरिया!

  " देखो प्रभु अगर हम मंदिर जाके भी एक पत्थर की मूर्ति को प्रणाम कर आयें या पंडित जी को मोटी धनराशी दे आयें उससे प्रभु प्रसन्न नहीं होंगे। मेरे ठाकुर तो सम्बन्ध मानने से प्रसन्न होते हैं।

जैसे कर्मा बाई ने माना , जैसे धन्ना जाट ने माना..."

भाव के भूखे हैं भगवान्.......

        ।। भाव्ग्राही भगवान् की जय ।।

Thursday, 23 February 2017

भगवान् नारायण ही सर्वोपरी हैं

नारायणो नाम नरो नराणां प्रसिद्धचौरः कथितः पृथिव्याम्।
अनेकजन्मार्जितपापसंचयं हरत्यशेषं श्रुतमात्र एव।।
'इस पृथ्वी पर 'नारायण' नामक एक नर (व्यक्ति) प्रसिद्ध चोर बताया गया है, जिसका नाम और यश कानों में प्रवेश करते ही मनुष्यों की अनेक जन्मों की कमाई हुई समस्त पाप राशि को हर लेता है।'
(वामन पुराण)
भगवान् नारायण ही सर्वोपरी हैं और उनके चरणों में अपने को सर्वतोभावेन समर्पित कर देना ही कल्याण का एकमात्र उपाय है । वे समस्त भूतों के ह्रदय में स्थित हैं । भगवान् ही माया से परे हैं और उनकी उपासना ही माया से छुटने का एकमात्र उपाय है । उन पर विश्वास करों, उनकी आराधना करों, उनके नाम की रट लगाओं और उनका गुणानुवाद करो । ॐ नमो नारायणाय ।
वे वास्तव में दया के पात्र है, जो भगवान् नारायण की उपासना नहीं करते । उन्होंने अपनी माता को व्यर्थ ही प्रसव कष्ट दिया । जो लोगो नारायण-नाम का उच्चारण नहीं करते, वे पाप ही खाते हैं और पाप में ही रहते है । जो लोग भगवान माधव को अपने ह्रदय मन्दिर में
स्थापितकरके प्रेम-रुपी सुमन से उनकी पूजा करते है, वे मृत्यु पाश से छुटते हैं ।
कल्याण, वर्ष २६, भक्त-चरितांक,पुस्तक कोड ४०, भक्त 'श्रीविष्णुचित (पेरी-आलवार)' जी के चरित्र से संकलित...
.......जय श्री हरि

Thursday, 7 July 2016

जहाँ कृष्ण है वही विजय है, वही गुण है,

अगर अपने जीवन को उत्सव बनाना चाहते है तो जहाँ गोविन्द चर्चा है वहाँ बैठो।
"कृष्ण भक्ति रसभावितामति क्रियताम् यदि कुतोपि लभ्यते"
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अरे,श्री कृष्ण भक्तिरसभावित मति यदि वैश्या के घर से भी मिलती हो तो वहाँ बैठो।
और विषयों में आसक्त करने वाली बात किसी मन्दिर और यज्ञशाला में भी होती हो तो वहाँ का मुँह मत देखो।
चार माला पहनकर भी ठाकुर से दूर ले जाये इस से बड़ा आपका कोई दुश्मन नहीं हो सकता और
चार गली देने के बाद भी अगर गोविन्द का स्मरण करवा दे तो इससे बड़ा मित्र नहीं हो सकता ।
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भक्तों से बढ़िया आपका कोई दोस्त नहीं हो सकता क्योंकि उनको आपसे कृष्ण लेने देने के अलावा कुछ नहीं चाहिये।।
अगर आपके दोस्त भक्त नहीं है तो या उन्हें भक्त बनाइये या फिर उन्हें छोड़ दे। क्योंकि ऐसा दोस्त चाहे जितना मर्ज़ी आपका साथ दे लेकिन आपका मनुष्य जन्म व्यर्थ कर देंगे जैसे की दुर्योधन ने कर्ण का किया।
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लेकिन वही अगर आपके दोस्त भक्त है तो आपकी भौतिक सहायता भी करेंगे और आपका जन्म भी सार्थक करेंगे। जैसे की श्री हनुमान और विभीषण।।
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यदि आप कृष्ण को चाहते हैं,
कृष्ण के अलावा और कुछ नहीं चाहना ,
यदि आप के पास कृष्ण है,
तो आप के पास सब कुछ है
यदि आप के पास सामग्री संपन्नता है ,
परन्तु कृष्ण नहीं ,
तो आप दिवालिया है कंगाल है आप
जहाँ कृष्ण है वही विजय है, वही गुण है,
वही श्री है, वही सोभाग्य है, सफलता है
सब कुछ वही है ।
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कृष्ण को केंद्रित करते हुए जीवन बिताये फिर देखे कृष्ण आपकी हर कदम पर रक्षा करेंगे कभी अपने भक्तों द्वारा कभी आपको सही प्रेरणा देकर,
कभी क़िसी और को निमीत्त बनाकर।।
अगर वो आपको पहाड़ की चोटी से फेंकेंगे तो यां तो उड़ना सिखा देंगे या फिर खुद पकड़ लेंगे लेकिन कभी गिरने नहीं देंगे।।
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"सोइ जानहि जेहि देहु जनाई
, जानत तुमहिं तुमहि हुई जाई"
कितना सुन्दर और सत्य अर्थ है मानस की सिर्फ इन दो �

Monday, 27 June 2016

द्रुढ- विश्वास


             एक आदमी की नई नई शादी हुई और वो अपनी पत्नि के साथ वापस आ रहे थे! रास्ते में वो दोनों एक बडी झील को नाव के द्वारा पार कर रहे थे, तभी अचानक एक भयंकर तूफ़ान आ गया ! वो आदमी वीर था लेकिन औरत बहुत डरी हुई थी क्योंकि हालात बिल्कुल खराब थे! नाव बहुत छोटी थी और तूफ़ान वास्तव में भयंकर था और दोनों किसी भी समय डूब सकते थे!
        लेकिन वो आदमी चुपचाप, निश्चल और शान्त बैठा था जैसे कि कुछ नहीं होने वाला हो!
          औरत डर के मारे कांप रही थी और वो बोली "क्या तुम्हें डर नहीं लग रहा" ये हमारे जीवन का आखरी क्षण हो सकता है! ऐसा नहीं लगता कि हम दूसरे किनारे पर कभी पहुंच भी पायेंगे! अब तो कोई चमत्कार ही हमें बचा सकता है वर्ना हमारी मौत निश्चित है! क्या तुम्हें बिल्कुल डर नहीं लग रहा? कहीं तुम पागल वागल या पत्थर वत्थर तो नहीं हो?
          पती खूब हँसा और एकाएक उसने म्यान से 🗡तलवार निकाल ली ? औरत अब और परेशान हो गई कि वो क्या कर रहा था? तब वो उस नंगी तलवार को पत्नी की गर्दन के पास ले आया, इतना पास कि उसकी गर्दन और तलवार के बीच बिल्कुल कम फर्क बचा था क्योंकि तलवार लगभग उसकी गर्दन को छू रही थी!
वो अपनी पत्नि से बोला
"क्या तुम्हें डर लग रहा है"?
पत्नि खूब हँसी और बोली "जब तलवार तुम्हारे हाथ में है तो मुझे क्या डर"? मैं जानती हुँ कि तुम मुझे बहुत प्यार करते हो !
उसने तलवार वापिस म्यान में डाल दी और बोला कि "यही मेरा जवाब है" !
मैं जानता हुँ कि भगवन श्रीकृष्ण मुझे बहुत प्यार करते है और ये तूफ़ान उसके हाथ में है ! इस लिए जो भी होगा अच्छा ही होगा ! अगर हम बच गये तो भी अच्छा और अगर नहीं बचे तो भी अच्छा, क्योंकि सब कुछ उस 🙏भगवान🙏 के हाथ में है और वो आपने भक्तों के साथ कभी कुछ भी गलत नहीं कर सकते !
वो जो भी करेगा हमारे भले के लिए करेंगे।
ये द्रुढविश्वास है हमे......!!
*शिक्षा* :-- हमेशा *विश्वास* उसपर बनाये रक्खो
       ! "व्यक्ति को हमेशा उस परम-पिता परमात्मा पर विश्वास रखना चाहिये जो हमारे पूरे जीवन को बदल देता है "!.
🙏           हरी बोल