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Thursday, 7 July 2016

जहाँ कृष्ण है वही विजय है, वही गुण है,

अगर अपने जीवन को उत्सव बनाना चाहते है तो जहाँ गोविन्द चर्चा है वहाँ बैठो।
"कृष्ण भक्ति रसभावितामति क्रियताम् यदि कुतोपि लभ्यते"
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अरे,श्री कृष्ण भक्तिरसभावित मति यदि वैश्या के घर से भी मिलती हो तो वहाँ बैठो।
और विषयों में आसक्त करने वाली बात किसी मन्दिर और यज्ञशाला में भी होती हो तो वहाँ का मुँह मत देखो।
चार माला पहनकर भी ठाकुर से दूर ले जाये इस से बड़ा आपका कोई दुश्मन नहीं हो सकता और
चार गली देने के बाद भी अगर गोविन्द का स्मरण करवा दे तो इससे बड़ा मित्र नहीं हो सकता ।
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भक्तों से बढ़िया आपका कोई दोस्त नहीं हो सकता क्योंकि उनको आपसे कृष्ण लेने देने के अलावा कुछ नहीं चाहिये।।
अगर आपके दोस्त भक्त नहीं है तो या उन्हें भक्त बनाइये या फिर उन्हें छोड़ दे। क्योंकि ऐसा दोस्त चाहे जितना मर्ज़ी आपका साथ दे लेकिन आपका मनुष्य जन्म व्यर्थ कर देंगे जैसे की दुर्योधन ने कर्ण का किया।
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लेकिन वही अगर आपके दोस्त भक्त है तो आपकी भौतिक सहायता भी करेंगे और आपका जन्म भी सार्थक करेंगे। जैसे की श्री हनुमान और विभीषण।।
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यदि आप कृष्ण को चाहते हैं,
कृष्ण के अलावा और कुछ नहीं चाहना ,
यदि आप के पास कृष्ण है,
तो आप के पास सब कुछ है
यदि आप के पास सामग्री संपन्नता है ,
परन्तु कृष्ण नहीं ,
तो आप दिवालिया है कंगाल है आप
जहाँ कृष्ण है वही विजय है, वही गुण है,
वही श्री है, वही सोभाग्य है, सफलता है
सब कुछ वही है ।
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कृष्ण को केंद्रित करते हुए जीवन बिताये फिर देखे कृष्ण आपकी हर कदम पर रक्षा करेंगे कभी अपने भक्तों द्वारा कभी आपको सही प्रेरणा देकर,
कभी क़िसी और को निमीत्त बनाकर।।
अगर वो आपको पहाड़ की चोटी से फेंकेंगे तो यां तो उड़ना सिखा देंगे या फिर खुद पकड़ लेंगे लेकिन कभी गिरने नहीं देंगे।।
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"सोइ जानहि जेहि देहु जनाई
, जानत तुमहिं तुमहि हुई जाई"
कितना सुन्दर और सत्य अर्थ है मानस की सिर्फ इन दो �