Saturday, 17 June 2017

षड् विधा शरणागति


 💐 प्रथम शरणागति
      शरणमें आने के बाद प्रथम भक्त को यह चाहिए कि किसी भी परिस्थिति में प्रभु के अनुकूल रहेना। जिस प्रकार एक सेवक  स्वामी का अनुसरण करता है।
🌷 द्वितीय शरणागति
     भक्त को कभी भी एसी क्रिया नहीं करनी चाहिए, जिससे प्रभु रुष्ट हो जायें। अर्थात् प्रभु को अप्रसन्न करने वाले सभी प्रतिकूल पदार्थों का हार्दिक परित्याग करना।
 🥀 तृतीय शरणागति
     अपने प्रभु के प्रति दृढ़ विश्वास रखना चाहिए औऱ मन में यह विचारना चाहिए कि हमारे मस्तक पर श्रीनाथजी का हस्त कमल है। अतः हमारे लौकिक औऱ पारलौकिक सभी कार्यों को स्वतः सिद्ध करेंगे। और वह जैसा करेंगे उसी में हमारा कल्याण है। एसा दृढ़ विश्वास कभी नहीं छोडना चाहिए।
🌸 चतुर्थ शरणागति 
     भक्त को यह विचारना चाहिए की हमारा पाणिग्रहण सर्व समर्थ भगवान श्रीकृष्ण ने किया है। अतः हमें चिंता करने कि कोई भी आवश्यकता नहीं है। हमारे मस्तक पर चौदह भूवन के पति श्रीनाथजी सदा बिराजते है। अतः हमें ना कोई भय है ना चिन्ता।
🌼 पाँचवी शरणागति 
       यहाँ आत्मनिवेदन कि बात समझाई गई है। जिसका भाव ब्रह्मसंबंध होता है।जब हमने अपनी आत्मा को श्रीकृष्ण को निवेदित कर दिया है। तो भला बताओ हमारे पास क्या पदार्थ और शेष रहा जिसके रक्षण एवं भरण पोषण की चिन्ता करें। हमारेपास जो कुछ भी है सब प्रभु का है। अतः पूर्णतया निश्चिंत रहना चाहिए।
🌹 छठी शरणागति
     यहाँ वैष्णवो को दिनता का दिव्य पाठ पढाया जाता है। क्योंकि दीनता होने पर ही प्रभु कृपा होती है। भक्तों के लिए तो दीनता ही हरि को प्रसन्न करने का एकमात्र साधन है। 
श्रीवल्लभाधीश की जय।

समुद्र की लहरों के रुकने तक


एक व्यक्ति तौलिया लपेटे समुद्र के किनारे चहल–कदमी कर रहा था। कभी वह लहरों के निकट जाता अौर फिर पीछे हट जाता, एेसा करते करते उसे सुबह से शाम हो गयी तब एक सज्जन जो उसे पीछे अपने घर की छत से देख रहेथे अाए अौर पूछे – क्या समस्या है? क्या मैं अापकी कुछ सहायता कर सकता हूँ?

तब उस व्यक्ति ने कहा, मुझे समुद्र में स्नान करना है अौर मैं लहरों के रुकने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ।

क्या एेसा होने वाला है?

क्या समुद्र की लहरे कभी रुकेंगी?

यही स्थिति इस भौतिक जगत् की है। इस जगत् की समस्याएँ समुद्र की लहरों के समान हैं जो कभी रुकने वाली नहीं हैं।

इस भौतिक जगत् को दु:खालयम कहा गया है, जैसे हिमालय हिम से भरा रहता है, पुस्तकालय पुस्तकों से, भोजनालय भोजन से – उसी प्रकार इस भौतिक जगत् में दु:खों का अाना–जाना तो चलता ही रहेगा।

यदि कोई व्यक्ति यह कहे कि मैं इस समस्या के समाधान के बाद भगवान् में मन लगाऊँगा या अब उस समस्या के समाप्त होने पर तो वह अपने अाप को ही धोखा दे रहा है क्योंकि जब तक हम इस भौतिक जगत् में हैं, समस्यायेंतो रहेंगी ही। यदि हम अपना पूरा ध्यान समस्याअों पर ही लगाकर रखेंगे तो अपना मुख्य कार्य भूल जायेंगे अौर वह है कृष्णभावनाभावित बनना। भगवान् के विषय में चर्चा करने की जगह हम समस्याअों के बारे में ही सोचेंगे अौरबाते करेंगे। अौर रहस्य तो यह है कि जब हम अपने मन को भगवान् में लगाते हैं तो इस जगत् की समस्याअों से प्रभावित नहीं होती, समस्याएँ तो अायेंगी परन्तु वह हमारे मन को व्यथित नहीं कर पायेंगी।

इसलिए हमें यह समझना होगा कि समस्याएँ हों या न हों हमें अपना कीमती समय भगवान् के चिन्तन का अभ्यास करने में अवश्य लगाना है तब ही हमेशा के लिए हम इस भौतिक जगत् से मुक्त होकर वैकुण्ठ पहुँच पायेंगे जहाँकोई कुण्ठा या चिन्ता नहीं होती। होता है तो केवल भगवान् के सानिध्य में असीम अानंद। हरे कृष्ण।

Monday, 5 June 2017

भगवान को अपनी समस्या सौंपकर निर्भार हो जाओ

बहुत ही ज्ञानवर्धक कथा जरूर पढें! 

- - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - -

पानी के उत्तम गुणों के कारण ही वृक्ष हरा भरा रहता है क्योंकि उस पानी के कारण ही व उसके प्रभाव से ही वृक्ष पल्लवित हुआ है। किन्तु सूखी लकड़ी को कितनी भी पानी में डुबो दो वह हरा भरा नहीं हो सकता है, क्योंकि उसमे पानी ग्रहण करने की शक्ति नही रहती है। इसी प्रकार जिज्ञासु लोग ही सद्गुरु के ज्ञान को ग्रहण कर पाते है।
- - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - -

एक साधु भिक्षा लेने एक घर में गये । उस घर में माई भोजन बना रही थी और पास में बैठी उसकी लगभग 8 वर्ष की पुत्री बिलख-बिलखकर रो रही थी । साधु का हृदय करुणा से भर गया, वे बोले : ‘‘माता ! यह बच्ची क्यों रो रही है ?’’ 
माँ भी रोने लगी, बोली : ‘‘महाराजजी ! आज रक्षाबंधन है । मुझे कोई पुत्र नहीं है । मेरी बिटिया मुझसे पूछ रही है कि ‘मैं किसके हाथ पर राखी बाँधूँ ?’ समझ में नहीं आता कि मैं क्या उत्तर दूँ, इसके पिताजी भी नहीं हैं ।’’
साधु ऊँची स्थिति के धनी थे, बोले : ‘‘हे भगवान ! मैं साधु बन गया तो क्या मैं किसीका भाई नहीं बन सकता !’’ बालिका की तरफ हाथ बढ़ाया और बोले : ‘‘बहन ! मैं तुम्हारा भाई हूँ, मेरे हाथ पर राखी बाँधो ।’’
साधु ने राखी बँधवायी और लीला नामक उस बालिका के भाई बन गये । लीला बड़ी हुई, उसका विवाह हो गया । कुछ वर्षों बाद उसके पेट में कैंसर हो गया । अस्पताल में लीला अंतिम श्वास गिन रही थी । घरवालों ने उसकी अंतिम इच्छा पूछी । 
लीला ने कहा : ‘‘मेरे भाईसाहब को बुलवा दीजिये ।’’
साधु महाराज ने अस्पताल में ज्यों ही लीला के कमरे में प्रवेश किया, त्यों ही लीला जोर-जोर से बोलने लगी : ‘‘भाईसाहब ! कहाँ है भगवान ? कह दो उसे कि या तो लीला की पीड़ा हर ले या प्राण हर ले, अब मुझसे कैंसर की पीड़ा सही नहीं जाती ।’’ 
लीला लगातार अपनी प्रार्थना दोहराये जा रही थी । साधु महाराज लीला के पास पहुँचे और उन्होंने शांत भाव से कुछ क्षणों के लिए आँखें बंद कीं, फिर अपने कंधे पर रखा वस्त्र लीला की तरफ फेंका और बोले : ‘‘जाओ बहन ! या तो प्रभु तुम्हारी पीड़ा हर लेंगे या प्राण ले लेंगे ।’’ 
उनका बोलना, वस्त्र का गिरना और लीला का उठकर खड़े हो जाना - सब एक साथ हो गया Ÿ। लीला बोल उठी : ‘‘कहाँ है कैंसर ! मैं एकदम ठीक हूँ, घर चलो ।’’
लीला की जाँच की गयी, कैंसर का नामोनिशान नहीं मिला । घर आकर साधु ने हँसकर पूछा : ‘‘लीला ! अभी मर जाती तो ?’’
लीला बोली : ‘‘मुझे अपने दोनों छोटे बच्चों की याद आ रही थी, उनकी चिंता हो रही थी ।’’
‘‘इसलिए प्रभु ने तुम्हें प्राणशक्ति दी है, बच्चों की सेवा करो, बंधन तोड़ दो, मरने के लिए तैयार हो जाओ ।’’ ऐसा कहकर साधु चले गये । 
लीला सेवा करने लगी, बच्चे अब चाचा-चाची के पास अधिक रहने लगे । ठीक एक वर्ष बाद पुनः लीला के पेट में पहले से जबरदस्त कैंसर हुआ, वही अस्पताल, वही वार्ड, संयोग से वही पलंग ! लीला ने अंतिम इच्छा बतायी : ‘‘मेरे भाईसाहब को बुलाइये ।’’
साधु बहन के पास पहुँचे, पूछा : ‘‘क्या हाल है ?’’ 
लीला एकदम शांत थी, उसने अपने भाई का हाथ अपने सिर पर रखा, वंदना की और बोली : ‘‘भाईसाहब ! मैं शरीर नहीं हूँ, मैं अमर आत्मा हूँ, मैं प्रभु की हूँ, मैं मुक्त हूँ...’’ कहते-कहते ॐकार का उच्चारण करके लीला ने शरीर त्याग दिया ।
लीला के पति दुःखी होकर रोने लगे । साधु महाराज उन्हें समझाते हुए बोले : ‘‘भैया ! क्यों रोते हो ? अब लीला का जन्म नहीं होगा, लीला मुक्त हो गयी ।’’ फिर वे हँसे और दुबारा बोले : ‘‘हम जिसका हाथ पकड़ लेते हैं, उसे मुक्त करके ही छोड़ते हैं ।’’
पति का दुःख कम हुआ । उन्होंने पूछा : ‘‘महाराज ! गत वर्ष लीला तत्काल ठीक कैसे हो गयी थी, आपने क्या किया था ?’’
‘‘गत वर्ष लीला ने बार-बार मुझसे पीड़ा या प्राण हर लेने के लिए प्रभु से प्रार्थना करने को कहा । मैंने प्रभु से कहा : ‘हे भगवान ! अब तक लीला मेरी बहन थी, इस क्षण के बाद वह आपकी बहन है, अब आप ही सँभालिये ।’ प्रभु पर छोड़ते ही प्रभु ने अपनी बहन को ठीक कर दिया । यह है प्रभु पर छोड़ने की महिमा !’’
इंसाँ की अज्म से जब दूर किनारा होता है ।
तूफाँ में टूटी किश्ती का 
एक भगवान सहारा होता है ।।
ऐसे ही जब आपके जीवन में कोई ऐसी समस्या, दुःख, मुसीबत आये जिसका आपके पास हल न हो तो आप भी घबराना नहीं बल्कि किसी एकांत कमरे में चले जाना और भगवान, सद्गुरु के चरणों में प्रार्थना करके सब कुछ उनको सौंप देना और शांत-निर्भार हो जाना । फिर जिसमें आपका परम मंगल होगा, परम हितैषी परमात्मा वही करेंगे ।

         नारायण नारायण 
 लक्ष्मीनारायण भगवान की जय

Saturday, 3 June 2017

हमारा सबसे बड़ा धन

संसार में जिनके पास भी श्रीराधाकृष्ण की प्रेमरूपी संपत्ति है, वही सर्वाधिक धनी हैं. संसार की अन्य समस्त सम्पत्तियाँ, जिनके पीछे हम अज्ञानतावश भागते हैं और उन्हें अपने सुख का साधन समझने की भूल करते हैं, वे सब की सब नश्वर हैं.

संसारी ऐश्वर्य आदि को प्राप्त कर लेने पर हमको सुख मिलेगा, यह भ्रान्ति है. इनमें तो स्थिरता ही नहीं है. आज है, कल नहीं है. वस्तुतः संसार में ऐश्वर्यवान व्यक्ति ही अधिक दुःखी दिखलाई पड़ते हैं. जड़ पदार्थों की गुलामी हमारे मन-बुद्धि को को भी जड़ बना देती है. इनसे आनन्द अथवा रस की प्राप्ति कभी भी नहीं हो सकती है. यह सिर्फ कहने की ही नहीं, अपितु सबका व्यक्तिगत अनुभव है. जड़-पदार्थों से संपन्न समृद्धशाली व्यक्तियों के हृदय में सुख नहीं है, शान्ति नहीं है, वे त्रस्त हैं और तनावों से घिरे हुए हैं.

आध्यात्म कहता है कि हमारा वास्तविक धन है भगवत्-प्रेम. वस्तुतः प्रेम ऐसी वस्तु है जिसे भगवान् से भी बड़ा बताया गया है. इस प्रेम के अंडर में भगवान् हो जाते हैं. प्रेम भगवान् को बाँध लेती है. जिनके पास भी यह दिव्य प्रेम होता है, वह ऐसा महानतम् धनी है जिसके पीछे पीछे भगवान् घूमते हैं. ग्वालों के प्रेमाधीन कृष्ण घोड़ा बनकर सवारी कराते हैं, यशोदा मैया से ऊखल बंध जाते हैं और गोपियों की छाछ के लिए नाचते हैं और उनकी गालियों के लिए ब्रज की गली-गली मचलते फिरते हैं. यह प्रेमधन ही वास्तविक धन है. यह लुटाने से लुटता नहीं, वरन् इस धन के धनी दूसरों को भी प्रदान कर सदा के लिए आनंदमय कर देते हैं. इसके आगे सांसारिक ऐश्वर्य, जो ब्रम्हलोक तक विस्तृत है, सो भी नगण्य ही है. ब्रम्हा भी प्रेम की सिरमौर गोपियों की चरणधूलि की कामना करते हैं.

इसलिए ही श्रीरायरामानन्द-संवाद में महाप्रभु गौरांग रामानंद जी से प्रश्न करते हैं कि संपत्तियों के मध्य जीव की सबसे बड़ी संपत्ति क्या है? तो रामानंद उत्तर देते हैं कि जिनके पास श्रीराधाकृष्णरुप प्रेमसम्पत्ति है, वही सबसे बड़े धनी हैं.

*सम्पत्तिर मध्ये जीवेर कोन् संपत्ति गणि ?*
*'राधाकृष्णे  प्रेम  याँर,  सेइ  बड़  धनी ।।'*
_(श्रीरायरामानन्द-संवाद)_

इसी संवाद का निरूपण करते हुए भक्तियोगरस के अवतार जगद्गुरुत्तम् श्री कृपालु जी महाराज अपने _'राधा गोविन्द गीत'_ (दोहा 5593, 5598) में गाते हैं :

*'सर्वश्रेष्ठ धन कौन गोविन्द राधे । राय कहें कृष्णप्रेमधन है बता दे ।।*
*सर्वश्रेष्ठ स्मरण कौन गोविन्द राधे । राय कहें कृष्णगुण, लीला बता दे ।।'*

 उस सबसे बड़े धन की प्राप्ति करने के लिए ही हमें साधना करनी है, यद्यपि वह कृपासाध्य है, साधनसाध्य नहीं है तथापि उस कृपा की प्राप्ति के लिए हमें अपने अंतःकरण को निर्मल बनाना होगा, जिसके लिए उनके नाम, गुण, लीला, धाम आदि का परम निष्कामभावयुक्त होकर रूपध्यानपूर्वक संकीर्तन सबसे सरल साधन है. यह संकीर्तन बड़े से बड़े पापत्माओं के पाषाण हृदय में भी भगवद्-रस का संचार कर देता है. श्री कृपालु महाप्रभु जी की _'राधा गोविन्द गीत'_ (दोहा 4613, 4506) गाती है :

*'बार बार पढ़ो सुनो गोविन्द राधे । हरि का चरित्र प्रेम पैदा करा दे ।।*
*कभु राधे कभु श्याम गोविन्द राधे । बारी बारी ते दोनों के गुन गा दे ।।'* 

कलियुग में हरिनाम संकीर्तन ही सार है, और दूसरा कुछ सार नहीं है.

Tuesday, 2 May 2017

प्रार्थना

श्रीमद्भागवत पुराण में कथा आती है कि खट्वांग को दो घड़ी में भगवान् के दर्शन हो गये थे, यदि कोई भी व्यक्ति हर रोज़ नीचे लिखी तीनों प्रार्थनाओं को करे, जिसमें दो मिनट का समय लगता है, तो उसे निश्चित रूप से इसी जन्म में भगवद्-प्राप्ति हो जायेगी। यह तीनों प्रार्थनाएँ सभी ग्रंथों, वेदों तथा पुराणों का सार हैं।

🌹पहली प्रार्थना
रात को सोते समय भगवान् से प्रार्थना करो –
‘‘हे मेरे प्राणनाथ गोविंद ! जब मेरी मौत आवे और मेरे अंतिम सांस के साथ, जब आप मेरे तन से बाहर निकलो तब आपका नाम उच्चारण करवा देना। भूल मत करना।’’

🌹दूसरी प्रार्थना
प्रातःकाल उठते ही भगवान् से प्रार्थना करो –
‘‘हे मेरे प्राणनाथ ! इस समय से लेकर रात को सोने तक, मैं जो कुछ भी कर्म करूँ, वह सब आपका समझ कर ही करूँ और जब मैं भूल जाऊँ, तो मुझे याद करवा देना।’’ 

🌹तीसरी प्रार्थना
प्रातःकाल स्नान इत्यादि करने तथा तिलक लगाने के बाद भगवान् से प्रार्थना करो –
‘‘हे मेरे प्राणनाथ ! गोविंद! आप कृपा करके मेरी दृष्टि ऐसी कर दीजिये कि मैं प्रत्येक कण-कण तथा प्राणीमात्र में आपका ही दर्शन करूँ।’’
आवश्यक सूचना

इन तीनों प्रार्थनाओं को तीन महीने लगातार करना बहुत जरूरी है। तीन महीने के बाद अपने आप अभ्यास हो जाने पर प्रार्थना करना स्वभाव बन जायेगा ॥