Wednesday 23 August 2017

भगवान की कृपा या अकृपा

🔵 एक व्यक्ति नित्य हनुमान जी की मूर्ति के आगे दिया जलाने जाया करता था। एक दिन मैंने उससे इसका कारण पूछा तो उसने कहा- ”मैंने हनुमान जी की मनौती मानी थी कि यदि मुकदमा जीत जाऊँ तो रोज उनके आगे दिया जलाया करूंगा। मैं जीत गया और तभी से यह दिया जलाने का कम चल रहा है।

🔴 मेरे पूछने पर मुकदमे का विवरण बताते हुए उसने कहा- एक गरीब आदमी की जमीन मैंने दबा रखी थी, उसने अपनी जमीन वापिस छुड़ाने के लिए अदालत में अर्जी दी, पर वह कानून जानता न था और मुकदमें का खर्च भी न जुटा पाया। मैंने अच्छे वकील किए खर्च किया और हनुमान जी मनौती मनाई। जीत मेरी हुई। हनुमान जी की इस कृपा के लिए मुझे दीपक जलाना ही चाहिए था, सो जलाता भी हूँ।

🔵 मैंने उससे कहा-भोले आदमी, यह तो हनुमान जी की कृपा नहीं अकृपा हुई। अनुचित कार्यों में सफलता मिलने से तो मनुष्य पाप और पतन के मार्ग पर अधिक तेजी से बढ़ता है, क्या तुझे इतना भी मालूम नहीं। मैंने उस व्यक्ति को एक घटना सुनाई-’एक व्यक्ति वेश्यागमन के लिए गया। सीढ़ी पर चढ़ते समय उसका पैर फिसला और हाथ की हड्डी टूट गई। अस्पताल में से उसने सन्देश भेजा कि मेरी हड्डी टूटी यह भगवान की बड़ी कृपा है। वेश्यागमन के पाप से बच गया।

🔴 मनुष्य सोचता है कि जो कुछ वह चाहे उसकी पूर्ति हो जाना ही भगवान ही कृपा है। यह भूल है। यदि उचित और न्याययुक्त सफलता मिले तो ही उसे भगवान की कृपा कहना चाहिए। पाप की सफलता तो प्रत्यक्ष अकृपा है। जिससे अपना पतन और नाश समीप आता है उसे अकृपा नहीं तो और क्या कहें?

Thursday 22 June 2017

God Can Be Attained Assuredly Today

At least test my statement !  and see for yourself ! God is not attained by you, because you do not want Him.  If you want wealth, then how can God intervene? The worst thing in the world is money - wealth. There is nothing more despicable than wealth-money – nothing whatsoever. If your mind is engrossed in such a worthless thing, how can God be attained ? By giving money you can purchase food, clothes, vehicles etc., but money itself cannot be eaten, worn or ridden on. The point is that money itself is of no use at all. Rather its utility is what matters.

God can be attained purely by desire (i.e. earnest aspiration, longing). No one at all will be able to restrict Him if you have a burning desire. If a child is weeping, the mother definitely comes. The child does not do any household chores. On the contrary, he hinders your work. But when the child cries, everyone in the household is on his side. All members of the family – mother-in-law, father-in-law, brother-in-law, all of them say, "Oh, why don't you do something for this little one, carry him and console him." The mother has to stop all her work to carry and take care of the child. The only power the child possesses is loud crying – "Baalaani rodun balam" - "To weep is the power of the children". If you were to sincerely weep for God, earnestly cry and call out to Him, then all devotees, saints, noble souls would take up your side and invoke God by complaining – "Why do you not appear before him?"

God Can Be Attained Assuredly Today


Truly speaking, God is ever attained, but only our worldly desires bar Him from being realized. When we desire money and enjoyments, God does not forcibly make us leave it? If we earnestly aspire for only God, leaving aside all worldly desires, then who has the strength to block us from doing so? Absolutely no one has the power to restrict us. If we long to behold God then God also will long to behold us. If we long and cry out for the world, the world will not reciprocate. But if we call out and cry longingly for God, He too will surely cry out for us.

It is only the mother who truly knows whether the child is really crying or not. If a child does not shed real tears and simply utters the sound of weeping, the mother understands that he is cheating, pretending! If the child truly weeps, the mother can tell instantly from his breathing. The mother stops everything she is doing and immediately carries the child. What is the use of a mother that does not pay immediate attention to her child in desperation! What is the use of her living, if she neglects the child? Similarly what is the use of God who is not paying attention to the one who truly longs, cries and calls out for Him? If God does not meet such a devotee, then what is the use of God’s existent. If God does not meet one who is sincerely longing for Him from within, then God should not live!

Attraction

Here we have got attraction, material, so we have to withdraw this attraction. How it will be possible? If we become more attracted to Krsna, then this attraction will go away. Bhaktih paresanubhavo viraktir anyatra syat [SB 11.2.42]. Bhakti means the more you realize Krsna, the more you will become detestful: "Ah, nonsense." This is test. One side increasing taste, the other side decreasing. This is the test.
If we think that "I have got attraction on Krsna and also the sense gratification," that means bogus. The test is how far I am detached to sense gratification. Then it means that you have increased your spiritual life. And Yamunacarya says,
yad-avadhi mama cetah krsna-padaravinde
nava-nava-dhamany udyatam rantum asit
tad-avadhi bata nari-sangame smaryamane
bhavati mukha-vikarah susthu nisthivanam ca
[Sri Yamunacarya]
This is the test. Yamunacarya, he was emperor. He said, "Since I have taken to Krsna consciousness and I am enjoying Krsna's association, since then, as soon as I think of sex, I spit on it." This is the test. This is test. Krsna... How I am increasing my Krsna consciousness, the test is how I am decreasing my sex attachment. This is test. A man is suffering from fever, that means how much he is becoming cured means how much he has decreased the degree of fever. This is the test. It is not that I have got 105-degrees fever and I am advancing and curing. That is not. This is the test, the vita-raga. You have got attachment for this material world, and the central point of attachment is sex. All man, birds, beast, everyone — test.

Wednesday 21 June 2017

God Can Be Attained Assuredly Today


But if you yourself put a bar that God cannot appear, He will surely not appear! It has been declared explicitly in Gita –

"Api chetsuduraachaaro bhajate maam anayabhaak,
saadhureva sa mantavyah, samyagvyavasito hi sah
ksipram bhavati dharamaatmaa sasvacchaantim nigacchati
kaunteya pratijaaneehi na me bhaktah pranasyati."
(Gita 9:30-31)

"Even if the vilest of sinner worships Me with exclusive devotion, he should be considered a saint in as much as he has rightly resolved. Speedily, he becomes virtuous and secures lasting peace. Know it for certain, Arjuna, that My devotee never falls. " (Gita 9:30-31)

The point here is – even if the vilest sinner becomes an exclusive devotee, in other words, other than God he is desirous of nothing else, he also should be considered a saint, because he has rightly resolved that God will be certainly attained.

Desire only God, and don't desire anything else. Neither desire to live, nor desire to die. There should be neither desire for respect, nor desire for greatness. Let there be neither desire for enjoyments, nor desire for wealth. Only one desire – God, then He will surely be attained.

Saturday 17 June 2017

षड् विधा शरणागति


 💐 प्रथम शरणागति
      शरणमें आने के बाद प्रथम भक्त को यह चाहिए कि किसी भी परिस्थिति में प्रभु के अनुकूल रहेना। जिस प्रकार एक सेवक  स्वामी का अनुसरण करता है।
🌷 द्वितीय शरणागति
     भक्त को कभी भी एसी क्रिया नहीं करनी चाहिए, जिससे प्रभु रुष्ट हो जायें। अर्थात् प्रभु को अप्रसन्न करने वाले सभी प्रतिकूल पदार्थों का हार्दिक परित्याग करना।
 🥀 तृतीय शरणागति
     अपने प्रभु के प्रति दृढ़ विश्वास रखना चाहिए औऱ मन में यह विचारना चाहिए कि हमारे मस्तक पर श्रीनाथजी का हस्त कमल है। अतः हमारे लौकिक औऱ पारलौकिक सभी कार्यों को स्वतः सिद्ध करेंगे। और वह जैसा करेंगे उसी में हमारा कल्याण है। एसा दृढ़ विश्वास कभी नहीं छोडना चाहिए।
🌸 चतुर्थ शरणागति 
     भक्त को यह विचारना चाहिए की हमारा पाणिग्रहण सर्व समर्थ भगवान श्रीकृष्ण ने किया है। अतः हमें चिंता करने कि कोई भी आवश्यकता नहीं है। हमारे मस्तक पर चौदह भूवन के पति श्रीनाथजी सदा बिराजते है। अतः हमें ना कोई भय है ना चिन्ता।
🌼 पाँचवी शरणागति 
       यहाँ आत्मनिवेदन कि बात समझाई गई है। जिसका भाव ब्रह्मसंबंध होता है।जब हमने अपनी आत्मा को श्रीकृष्ण को निवेदित कर दिया है। तो भला बताओ हमारे पास क्या पदार्थ और शेष रहा जिसके रक्षण एवं भरण पोषण की चिन्ता करें। हमारेपास जो कुछ भी है सब प्रभु का है। अतः पूर्णतया निश्चिंत रहना चाहिए।
🌹 छठी शरणागति
     यहाँ वैष्णवो को दिनता का दिव्य पाठ पढाया जाता है। क्योंकि दीनता होने पर ही प्रभु कृपा होती है। भक्तों के लिए तो दीनता ही हरि को प्रसन्न करने का एकमात्र साधन है। 
श्रीवल्लभाधीश की जय।

समुद्र की लहरों के रुकने तक


एक व्यक्ति तौलिया लपेटे समुद्र के किनारे चहल–कदमी कर रहा था। कभी वह लहरों के निकट जाता अौर फिर पीछे हट जाता, एेसा करते करते उसे सुबह से शाम हो गयी तब एक सज्जन जो उसे पीछे अपने घर की छत से देख रहेथे अाए अौर पूछे – क्या समस्या है? क्या मैं अापकी कुछ सहायता कर सकता हूँ?

तब उस व्यक्ति ने कहा, मुझे समुद्र में स्नान करना है अौर मैं लहरों के रुकने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ।

क्या एेसा होने वाला है?

क्या समुद्र की लहरे कभी रुकेंगी?

यही स्थिति इस भौतिक जगत् की है। इस जगत् की समस्याएँ समुद्र की लहरों के समान हैं जो कभी रुकने वाली नहीं हैं।

इस भौतिक जगत् को दु:खालयम कहा गया है, जैसे हिमालय हिम से भरा रहता है, पुस्तकालय पुस्तकों से, भोजनालय भोजन से – उसी प्रकार इस भौतिक जगत् में दु:खों का अाना–जाना तो चलता ही रहेगा।

यदि कोई व्यक्ति यह कहे कि मैं इस समस्या के समाधान के बाद भगवान् में मन लगाऊँगा या अब उस समस्या के समाप्त होने पर तो वह अपने अाप को ही धोखा दे रहा है क्योंकि जब तक हम इस भौतिक जगत् में हैं, समस्यायेंतो रहेंगी ही। यदि हम अपना पूरा ध्यान समस्याअों पर ही लगाकर रखेंगे तो अपना मुख्य कार्य भूल जायेंगे अौर वह है कृष्णभावनाभावित बनना। भगवान् के विषय में चर्चा करने की जगह हम समस्याअों के बारे में ही सोचेंगे अौरबाते करेंगे। अौर रहस्य तो यह है कि जब हम अपने मन को भगवान् में लगाते हैं तो इस जगत् की समस्याअों से प्रभावित नहीं होती, समस्याएँ तो अायेंगी परन्तु वह हमारे मन को व्यथित नहीं कर पायेंगी।

इसलिए हमें यह समझना होगा कि समस्याएँ हों या न हों हमें अपना कीमती समय भगवान् के चिन्तन का अभ्यास करने में अवश्य लगाना है तब ही हमेशा के लिए हम इस भौतिक जगत् से मुक्त होकर वैकुण्ठ पहुँच पायेंगे जहाँकोई कुण्ठा या चिन्ता नहीं होती। होता है तो केवल भगवान् के सानिध्य में असीम अानंद। हरे कृष्ण।

Monday 5 June 2017

भगवान को अपनी समस्या सौंपकर निर्भार हो जाओ

बहुत ही ज्ञानवर्धक कथा जरूर पढें! 

- - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - -

पानी के उत्तम गुणों के कारण ही वृक्ष हरा भरा रहता है क्योंकि उस पानी के कारण ही व उसके प्रभाव से ही वृक्ष पल्लवित हुआ है। किन्तु सूखी लकड़ी को कितनी भी पानी में डुबो दो वह हरा भरा नहीं हो सकता है, क्योंकि उसमे पानी ग्रहण करने की शक्ति नही रहती है। इसी प्रकार जिज्ञासु लोग ही सद्गुरु के ज्ञान को ग्रहण कर पाते है।
- - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - -

एक साधु भिक्षा लेने एक घर में गये । उस घर में माई भोजन बना रही थी और पास में बैठी उसकी लगभग 8 वर्ष की पुत्री बिलख-बिलखकर रो रही थी । साधु का हृदय करुणा से भर गया, वे बोले : ‘‘माता ! यह बच्ची क्यों रो रही है ?’’ 
माँ भी रोने लगी, बोली : ‘‘महाराजजी ! आज रक्षाबंधन है । मुझे कोई पुत्र नहीं है । मेरी बिटिया मुझसे पूछ रही है कि ‘मैं किसके हाथ पर राखी बाँधूँ ?’ समझ में नहीं आता कि मैं क्या उत्तर दूँ, इसके पिताजी भी नहीं हैं ।’’
साधु ऊँची स्थिति के धनी थे, बोले : ‘‘हे भगवान ! मैं साधु बन गया तो क्या मैं किसीका भाई नहीं बन सकता !’’ बालिका की तरफ हाथ बढ़ाया और बोले : ‘‘बहन ! मैं तुम्हारा भाई हूँ, मेरे हाथ पर राखी बाँधो ।’’
साधु ने राखी बँधवायी और लीला नामक उस बालिका के भाई बन गये । लीला बड़ी हुई, उसका विवाह हो गया । कुछ वर्षों बाद उसके पेट में कैंसर हो गया । अस्पताल में लीला अंतिम श्वास गिन रही थी । घरवालों ने उसकी अंतिम इच्छा पूछी । 
लीला ने कहा : ‘‘मेरे भाईसाहब को बुलवा दीजिये ।’’
साधु महाराज ने अस्पताल में ज्यों ही लीला के कमरे में प्रवेश किया, त्यों ही लीला जोर-जोर से बोलने लगी : ‘‘भाईसाहब ! कहाँ है भगवान ? कह दो उसे कि या तो लीला की पीड़ा हर ले या प्राण हर ले, अब मुझसे कैंसर की पीड़ा सही नहीं जाती ।’’ 
लीला लगातार अपनी प्रार्थना दोहराये जा रही थी । साधु महाराज लीला के पास पहुँचे और उन्होंने शांत भाव से कुछ क्षणों के लिए आँखें बंद कीं, फिर अपने कंधे पर रखा वस्त्र लीला की तरफ फेंका और बोले : ‘‘जाओ बहन ! या तो प्रभु तुम्हारी पीड़ा हर लेंगे या प्राण ले लेंगे ।’’ 
उनका बोलना, वस्त्र का गिरना और लीला का उठकर खड़े हो जाना - सब एक साथ हो गया Ÿ। लीला बोल उठी : ‘‘कहाँ है कैंसर ! मैं एकदम ठीक हूँ, घर चलो ।’’
लीला की जाँच की गयी, कैंसर का नामोनिशान नहीं मिला । घर आकर साधु ने हँसकर पूछा : ‘‘लीला ! अभी मर जाती तो ?’’
लीला बोली : ‘‘मुझे अपने दोनों छोटे बच्चों की याद आ रही थी, उनकी चिंता हो रही थी ।’’
‘‘इसलिए प्रभु ने तुम्हें प्राणशक्ति दी है, बच्चों की सेवा करो, बंधन तोड़ दो, मरने के लिए तैयार हो जाओ ।’’ ऐसा कहकर साधु चले गये । 
लीला सेवा करने लगी, बच्चे अब चाचा-चाची के पास अधिक रहने लगे । ठीक एक वर्ष बाद पुनः लीला के पेट में पहले से जबरदस्त कैंसर हुआ, वही अस्पताल, वही वार्ड, संयोग से वही पलंग ! लीला ने अंतिम इच्छा बतायी : ‘‘मेरे भाईसाहब को बुलाइये ।’’
साधु बहन के पास पहुँचे, पूछा : ‘‘क्या हाल है ?’’ 
लीला एकदम शांत थी, उसने अपने भाई का हाथ अपने सिर पर रखा, वंदना की और बोली : ‘‘भाईसाहब ! मैं शरीर नहीं हूँ, मैं अमर आत्मा हूँ, मैं प्रभु की हूँ, मैं मुक्त हूँ...’’ कहते-कहते ॐकार का उच्चारण करके लीला ने शरीर त्याग दिया ।
लीला के पति दुःखी होकर रोने लगे । साधु महाराज उन्हें समझाते हुए बोले : ‘‘भैया ! क्यों रोते हो ? अब लीला का जन्म नहीं होगा, लीला मुक्त हो गयी ।’’ फिर वे हँसे और दुबारा बोले : ‘‘हम जिसका हाथ पकड़ लेते हैं, उसे मुक्त करके ही छोड़ते हैं ।’’
पति का दुःख कम हुआ । उन्होंने पूछा : ‘‘महाराज ! गत वर्ष लीला तत्काल ठीक कैसे हो गयी थी, आपने क्या किया था ?’’
‘‘गत वर्ष लीला ने बार-बार मुझसे पीड़ा या प्राण हर लेने के लिए प्रभु से प्रार्थना करने को कहा । मैंने प्रभु से कहा : ‘हे भगवान ! अब तक लीला मेरी बहन थी, इस क्षण के बाद वह आपकी बहन है, अब आप ही सँभालिये ।’ प्रभु पर छोड़ते ही प्रभु ने अपनी बहन को ठीक कर दिया । यह है प्रभु पर छोड़ने की महिमा !’’
इंसाँ की अज्म से जब दूर किनारा होता है ।
तूफाँ में टूटी किश्ती का 
एक भगवान सहारा होता है ।।
ऐसे ही जब आपके जीवन में कोई ऐसी समस्या, दुःख, मुसीबत आये जिसका आपके पास हल न हो तो आप भी घबराना नहीं बल्कि किसी एकांत कमरे में चले जाना और भगवान, सद्गुरु के चरणों में प्रार्थना करके सब कुछ उनको सौंप देना और शांत-निर्भार हो जाना । फिर जिसमें आपका परम मंगल होगा, परम हितैषी परमात्मा वही करेंगे ।

         नारायण नारायण 
 लक्ष्मीनारायण भगवान की जय

Saturday 3 June 2017

हमारा सबसे बड़ा धन

संसार में जिनके पास भी श्रीराधाकृष्ण की प्रेमरूपी संपत्ति है, वही सर्वाधिक धनी हैं. संसार की अन्य समस्त सम्पत्तियाँ, जिनके पीछे हम अज्ञानतावश भागते हैं और उन्हें अपने सुख का साधन समझने की भूल करते हैं, वे सब की सब नश्वर हैं.

संसारी ऐश्वर्य आदि को प्राप्त कर लेने पर हमको सुख मिलेगा, यह भ्रान्ति है. इनमें तो स्थिरता ही नहीं है. आज है, कल नहीं है. वस्तुतः संसार में ऐश्वर्यवान व्यक्ति ही अधिक दुःखी दिखलाई पड़ते हैं. जड़ पदार्थों की गुलामी हमारे मन-बुद्धि को को भी जड़ बना देती है. इनसे आनन्द अथवा रस की प्राप्ति कभी भी नहीं हो सकती है. यह सिर्फ कहने की ही नहीं, अपितु सबका व्यक्तिगत अनुभव है. जड़-पदार्थों से संपन्न समृद्धशाली व्यक्तियों के हृदय में सुख नहीं है, शान्ति नहीं है, वे त्रस्त हैं और तनावों से घिरे हुए हैं.

आध्यात्म कहता है कि हमारा वास्तविक धन है भगवत्-प्रेम. वस्तुतः प्रेम ऐसी वस्तु है जिसे भगवान् से भी बड़ा बताया गया है. इस प्रेम के अंडर में भगवान् हो जाते हैं. प्रेम भगवान् को बाँध लेती है. जिनके पास भी यह दिव्य प्रेम होता है, वह ऐसा महानतम् धनी है जिसके पीछे पीछे भगवान् घूमते हैं. ग्वालों के प्रेमाधीन कृष्ण घोड़ा बनकर सवारी कराते हैं, यशोदा मैया से ऊखल बंध जाते हैं और गोपियों की छाछ के लिए नाचते हैं और उनकी गालियों के लिए ब्रज की गली-गली मचलते फिरते हैं. यह प्रेमधन ही वास्तविक धन है. यह लुटाने से लुटता नहीं, वरन् इस धन के धनी दूसरों को भी प्रदान कर सदा के लिए आनंदमय कर देते हैं. इसके आगे सांसारिक ऐश्वर्य, जो ब्रम्हलोक तक विस्तृत है, सो भी नगण्य ही है. ब्रम्हा भी प्रेम की सिरमौर गोपियों की चरणधूलि की कामना करते हैं.

इसलिए ही श्रीरायरामानन्द-संवाद में महाप्रभु गौरांग रामानंद जी से प्रश्न करते हैं कि संपत्तियों के मध्य जीव की सबसे बड़ी संपत्ति क्या है? तो रामानंद उत्तर देते हैं कि जिनके पास श्रीराधाकृष्णरुप प्रेमसम्पत्ति है, वही सबसे बड़े धनी हैं.

*सम्पत्तिर मध्ये जीवेर कोन् संपत्ति गणि ?*
*'राधाकृष्णे  प्रेम  याँर,  सेइ  बड़  धनी ।।'*
_(श्रीरायरामानन्द-संवाद)_

इसी संवाद का निरूपण करते हुए भक्तियोगरस के अवतार जगद्गुरुत्तम् श्री कृपालु जी महाराज अपने _'राधा गोविन्द गीत'_ (दोहा 5593, 5598) में गाते हैं :

*'सर्वश्रेष्ठ धन कौन गोविन्द राधे । राय कहें कृष्णप्रेमधन है बता दे ।।*
*सर्वश्रेष्ठ स्मरण कौन गोविन्द राधे । राय कहें कृष्णगुण, लीला बता दे ।।'*

 उस सबसे बड़े धन की प्राप्ति करने के लिए ही हमें साधना करनी है, यद्यपि वह कृपासाध्य है, साधनसाध्य नहीं है तथापि उस कृपा की प्राप्ति के लिए हमें अपने अंतःकरण को निर्मल बनाना होगा, जिसके लिए उनके नाम, गुण, लीला, धाम आदि का परम निष्कामभावयुक्त होकर रूपध्यानपूर्वक संकीर्तन सबसे सरल साधन है. यह संकीर्तन बड़े से बड़े पापत्माओं के पाषाण हृदय में भी भगवद्-रस का संचार कर देता है. श्री कृपालु महाप्रभु जी की _'राधा गोविन्द गीत'_ (दोहा 4613, 4506) गाती है :

*'बार बार पढ़ो सुनो गोविन्द राधे । हरि का चरित्र प्रेम पैदा करा दे ।।*
*कभु राधे कभु श्याम गोविन्द राधे । बारी बारी ते दोनों के गुन गा दे ।।'* 

कलियुग में हरिनाम संकीर्तन ही सार है, और दूसरा कुछ सार नहीं है.

Tuesday 2 May 2017

प्रार्थना

श्रीमद्भागवत पुराण में कथा आती है कि खट्वांग को दो घड़ी में भगवान् के दर्शन हो गये थे, यदि कोई भी व्यक्ति हर रोज़ नीचे लिखी तीनों प्रार्थनाओं को करे, जिसमें दो मिनट का समय लगता है, तो उसे निश्चित रूप से इसी जन्म में भगवद्-प्राप्ति हो जायेगी। यह तीनों प्रार्थनाएँ सभी ग्रंथों, वेदों तथा पुराणों का सार हैं।

🌹पहली प्रार्थना
रात को सोते समय भगवान् से प्रार्थना करो –
‘‘हे मेरे प्राणनाथ गोविंद ! जब मेरी मौत आवे और मेरे अंतिम सांस के साथ, जब आप मेरे तन से बाहर निकलो तब आपका नाम उच्चारण करवा देना। भूल मत करना।’’

🌹दूसरी प्रार्थना
प्रातःकाल उठते ही भगवान् से प्रार्थना करो –
‘‘हे मेरे प्राणनाथ ! इस समय से लेकर रात को सोने तक, मैं जो कुछ भी कर्म करूँ, वह सब आपका समझ कर ही करूँ और जब मैं भूल जाऊँ, तो मुझे याद करवा देना।’’ 

🌹तीसरी प्रार्थना
प्रातःकाल स्नान इत्यादि करने तथा तिलक लगाने के बाद भगवान् से प्रार्थना करो –
‘‘हे मेरे प्राणनाथ ! गोविंद! आप कृपा करके मेरी दृष्टि ऐसी कर दीजिये कि मैं प्रत्येक कण-कण तथा प्राणीमात्र में आपका ही दर्शन करूँ।’’
आवश्यक सूचना

इन तीनों प्रार्थनाओं को तीन महीने लगातार करना बहुत जरूरी है। तीन महीने के बाद अपने आप अभ्यास हो जाने पर प्रार्थना करना स्वभाव बन जायेगा ॥
        

Saturday 29 April 2017

Mere to Girdhar Gopal

You think it has happened only with you - you only are sufferring. Fact is this is happening with every one- No exceptions !
 This world has been defined as DUKHALAYAM ! Here there are only pains and sorrows. So what then is there to worry or feel lonely about ?
With chain of 'me' and 'mine' hanging from neck ..the Jeeva is carrying world ( and sufferring) !
O Kabir ! Why there will be any bondage (sorrows) to that surrendered  devotee, who has taken exclusive shelter of Raam 
What wife? What Son? The world is very strange ! O Brother, who are you and from where you have come and what is your goal (where you have to go) ...think over this !!!
Again taking birth, again dying, again sleeping in the womb of mother...
This world is very complex...O Murare! Save me!! O Murare ! Save me)
Cry before God when alone !! Say- Enough ! Enough !! O God, I am yours, You are mine...nothing else is mine !! Bhaj Govindam! Bhaj Govindam !!
Say fearlessly : Mere to Girdhar Gopal, Doosaro Na Koi !!!

Nothing is really mine

Nothing is really mine except Krishna::::
I have searched the world and found nothing worthy of love::::
Since I seek the companionship of holy men:: 
there alone do I feel happy::
In the world I only weep.
A devotee having taken refuge in the Lord, if he firmly holds the sentiments and accepts that "I am God's and God is mine", then his fears, grief, worries, doubts and various other faults are wiped-out.  i.e. the support of these faults is wiped out.  From the perspective of devotion, all faults are due to disinclination for God.  
A devotee that has taken refuge in the Lord remains always free from sorrow. Grief never comes close to him at all. 
A devotee that has taken refuge in the Lord has no will of his own. He does not hold on to his own thoughts, nor is he insistent on having his own way.  The more that he is free of worries and fears, God's grace makes him all the more favorable automatically.  And the more that he worries, believing in his own powers, he creates a blot in the grace that is flowing his way.  In other words, worrying after taking refuge, creates an interference in the flow of that extra-ordinary, unique, never ending, indestructible, singular grace of the Lord.  (An Important Fact).

Search for Krishna



Search for Krishna. Realize the Beautiful. That is the highest goal not only of humanity, but for all creation. And all problems are harmonized and solved by that. It is a natural necessity within us, for our own interest. A sane man who does not want to deceive himself can't avoid the search for Krishna.
--------------------------------------------
Krishna already possesses everything that is, yet He will accept the offering of one who desires to please Him. The important element, in preparation, in serving and in offering, is to act with love for Krishna.
------------------------------------------------
Krishna loves us so much that he accompanies us even beyond death. Krishna’s love is pure & without motive. He does not expect anything in return from us, but always wants to give us the benefit. He is our ever well-wisher, we accept it or not, but Krishna has taken to our heart as his residence & is not ready to leave us for anything. Actually this is not a bad bargain. Because this sweetheart is incomparably attractive. Krishna  means  The All Attractive.

Vaikuntha



In the Vaikuntha, there is no such word as expectation. It is not in the vocabulary of devotees. If one day, you go back to Krishna if we use the word, "expect", Krishna will say "Excuse Me!!", because that word does not exist in spiritual kingdom. That word is part of the material kingdom. Husband expects from the wife and wife expects from the husband and we never meet the expectations and that is the truth. Nobody in this world meets anybody's expectations to the point he wants, because what he wants is a dream in this material world. As it is, the only thing we can expect in the material world is misery and quarrel. How can we expect anything else? The moment we expect, we become miserable. Every transaction in our life, we get into trouble because of expectation.

Some way or other

Some way or other, if someone establishes in his mind his continuous relationship with Kṛṣṇa, this relationship is called remembrance. About this remembrance there is a nice statement in the Viṣṇu Purāa, where it is said, "Simply by remembering the Supreme Personality of Godhead all living entities become eligible for all kinds of auspiciousness. Therefore let me always remember the Lord, who is unborn and eternal." In the Padma Purāa the same remembrance is explained as follows: "Let me offer my respectful obeisances unto the Supreme Lord Kṛṣṇa, because if someone remembers Him, either at the time of death or during his span of life, he becomes freed from all sinful reactions."
(Nectar of Devotion).

Krsna helps us

Krsna helps us remember or forget Him
Krsna gives us chance. If you want Krsna, then He will give you full chance how to have Krsna; and if you don’t want Krsna, then He will give you full chance how to forget Krsna. These things are going on. If you want to forget – if you want to enjoy life forgetting Krsna, forgetting God — then Krsna will give you all facilities so that you can forget. And if you want to enjoy life with Krsna consciousness, then Krsna will give you chance how to make your progress in Krsna consciousness. That is up to you. If you think without Krsna consciousness you will be happy, do that. Krsna does not object to that. Yathecchasi tatha kuru [Bg. 18.63]. Krsna, after advising Arjuna, He simply enquired, “Now I have explained to you everything. Whatever you desire, you can now do.” So immediately Arjuna replied, karisye vacanam tava: “Now I shall execute Your order.” That is Krsna consciousness. God does not interfere with your little independence. If you want to act according to the order of God, then God will help you. Even sometimes you fall down, if you become sincere, that “From this time I shall remain Krsna conscious and execute His orders,” then Krsna will help you in all respect. Even if you fall down He will excuse you, and He will give more intelligence: “Don’t do this. Now go on with your duty.” But if you want to forget Krsna, if you want to become happy without Krsna, He will give you so many chances that you will forget Krsna. He’ll forget, life after life. From Srila Prabhupada’s Srimad-Bhagavatam lecture in New York, 21 July 1971

Religious performers



We can see so many temple goers and religious performers . However, many of them are not leading a vedic way of life . To them God is a wish fulfilling tree . And But, on their part,  they can do anything to personal enjoyment . God has no business in it and He is expected to look the other way ! .
However, true Bhaktas are fully committed to Sree Krishna . They accept  and follow Bhagavan's teachings.
The intention of Sree Krishna's  avatar was to re-establish Vedic dharma and to teach Srimad Bhagavad Gita .
Bhagavan  urged the humanity to seek *SharanAgathi ( total surrender) in Him and lead a vedic way of life as stated in Gita , His literary incarnation .
Sree Krishna's advice  :  Do your duty, to the best of your abilities, for Me( Krishna) without any selfish motive, and remember Me at all times - before starting a work, at the completion of a task, and while inactive.
The one who wants to know Me, should only understand that I existed before creation, I exist in the creation, as well as after complete dissolution. Any other existence is nothing but My illusory energy (Maya). I exist within the creation and at the same time outside the creation. I am the all-pervading Supreme Lord who exists everywhere, in everything, and at all times. "
Please chant :
Hare Rama Hare Rama Rama Rama Hare Hare
Hare Krishna Hare Krishna Krishna Krishna Hare Hare

Goal of our life

The goal of our life is to establish the lost connection with the Supreme Personality - Sri Krishna.
 All of us are looking for love. However, we are trying to search for so called love in this material world - a world which is full of greed, envy, anger, false ego. This material world is full of sorrow and misery. It is a temporary world. One can land into problems at any step. Thus our attempts to find real happiness in this material world invariably ends up in frustration. Real happiness can be found when we reawaken to Krishna consciousness. Human life is a chance for us to reestablish this relationship.
 Krishna consciousness is achieved by always thinking of Him by chanting His holy name, serving him, and by spreading the glories of holy name.
Thus, when we are engaged in Krishna consciousness, we experience the highest transcendental love - love of Krishna or prema bhakti. Achieving prema bhakti is the goal of life. A life of eternity, knowledge and bliss!

Nautch party and vulgar music.



Do not attend nautch party and do not hear vulgar music. Give up musical entertainments. Do not hear worldly topics. This is the discipline of ear, the organ of hearing.
 Do not use scents. This is the discipline of nose, the organ of smell. Give up salt and sugar for a week. Live on simple food. Fast on Ekadasi days or live on milk. This is the discipline of tongue, the organ of taste.
 Fix the mind on your Krishn. Bring it back again and again when it wanders and fix it on the image. This is the Sadhana for checking the wandering mind and developing concentration. By constant, regular practice, you can fix the mind on God steadily.
 You may think or falsely conjecture that the senses are under your control. You may be duped. All of a sudden you will become a victim or a slave. You must have not only control of one Indriya but also Parama Vasyam or supreme control of all the Indriyas. The senses may become turbulent at any time. Reaction may set in. Beware!

Tuesday 25 April 2017

राम जी एक ही है

.बहुत ही ज्ञानवर्धक लेख जरूर पढें!

-----------------------------------------------------

अपनी प्रतिष्ठा का बहुत अच्छे से
ख़्याल रखें
क्योंकि यही है जिसकी उम्र
आप से ज़्यादा है l
-----------------------------------------------------


एक बार किसी ने कबीर जी को पूछा
 "किसको भज रहे हो जी?"
कबीर जी ने कहा" राम जी को"

फिर उसने पूछा "कौन से राम को?"

उसने कहा "मैंने सुना है राम तो कई हैं।

एक राम अवधेश कुमारा,
एक राम दसरथ कर बेटा ,
एक राम घट घट में लेटा,
एक राम है जगत पसारा
और एक राम है सभी से न्यारा।"

तो कबीर साहिब को हंसी आ गई और कबीर साहिब थोड़ा टेढ़ा बोल देते थे, दिल पर चुभ जाये ऐसी बात।
तो उन्होंने कहा -
"तुम्हारी दृष्टि में राम चार है तो मेरी दृष्टि में तुम्हारे बाप भी चार है।"

व्यक्ति को गुस्सा आया और बोला की महाराज ऐसे कैसे बोल रहे हो।

तो कबीर जी बोले की भाई क्रोद्ध मत करो । मैं तुम्हे चारो गिना देता हूँ:

एक बाप तेरे चाचा को भाई,
एक बाप तेरे दादा को जायो
एक बाप तेरे नाना को जवाई
एक बाप तेरे फूफा को सालो।

तो उस आदमी ने कहा महाराज ये तो चारो एक ही है।
तब कबीर साहिब बोले जैसे ये चारों एक है, वैसे ही राम भी एक ही है:
सोई राम अवधेश का राजा
सोई राम दसरथ कर बेटा
सोई राम घट घट में लेटा
सोई राम है जगत पसारा
सोई राम है सभी से न्यारा।

अतः राम एक ही है।

         नारायण नारायण

Monday 24 April 2017

one can gain all one’s desires



There can be no doubt that one can gain all one’s desires and can attain God by simply chanting the Name. It is very very true. Those, who have the ability, should, with body, mind and speech and with Bhakti, sing Naam. Those who have not that ability, may only repeat Ram Ram, Krishna Krishna, Hari Hari. Even they do not have to bother about either this life or next. Naam itself will take charge of their lives in this or the next world. You are crying on account of various shortages− shortage of food, shortage of money, shortage of clothes? Go on singing Naam, food will come to you without asking for it and you will be able to feed thousands of people. Even if you do not pray for money, heaps of it will fall on your feet on its own. You do not have to bother about the lack of clothes, you yourself will be able to clothe innumerable people. Even if you give up everything, peoperty and wealth will run after you to serve. I am not exaggerating Naam’s capability. I am not clouring my words. If you want to see actual froof, I can show it to you. Blow off the insignificant sorrows and disappointments of this world by the explosion of Naam and come along to that abode of eternal bliss. If there is anything to be desired in this world, it is to see Him face to face. Naam alone will make it possible for you to have that Darshan.
By  Sri Sri Thakur Sita Ram Das Omkarnath

surrender ourself to Lord Sri Krishna.



Why am I in ignorance?
We are in ignorance because we were not trained properly by our teachers.
Why am I in trouble?
We are in trouble because in ignorance we have done so many things that are not beneficial for us.
Why am I suffering?
Because of this ignorance and sinful activities we are now suffering in many ways.
Why am I not serious for self realization in Krishna-consciousness?
We are not serious because we have not yet realized that the only way we can be happy is to surrender to Krishna.
What is my position?
Our position is most fortunate because we have now come into contact with the Krishna consciousness movement.
Who am I?
We are the eternal servant of Krishna.
Why am I in a difficult position?
Our only difficulty is when we forget that we are Krishna’s eternal servant.
Where do I come from?
We  came originally from the spiritual world.
Where do I go?
Our ultimate destiny to return to your original home. We will achieve this destiny only when we fully surrender ourself to Lord Sri Krishna.
So now take full advantage of your human life by fully surrendering ourself as the eternal servant of Lord Krishna

Lord Brahma, Lord Siva


Lord Brahma, along with Lord Siva, saw the crystal-clear personal beauty of the Supreme Personality of Godhead, whose blackish body resembles a marakata gem, whose eyes are reddish like the depths of a lotus, who is dressed with garments that are yellow like molten gold, and whose entire body is attractively decorated. They saw His beautiful, smiling, lotuslike face, crowned by a helmet bedecked with valuable jewels. The Lord has attractive eyebrows, and His cheeks are adorned with earrings. Lord Brahma and Lord Siva saw the belt on the Lord’s waist, the bangles on Mis arms, the necklace on His chest, and the ankle bells on His legs. The Lord is bedecked with flower garlands, His neck is decorated with the Kaustubha gem, and He carries with Him the goddess of fortune and His personal weapons, like His disc and club. When Lord Brahmā, along with Lord Śiva and the other demigods, thus saw the form of the Lord, they all immediately fell to the ground, offering their obeisances. SB 8.6.3, SB 8.6.4, SB 8.6.5, SB 8.6.6, SB 8.6.7, SB 8.6.3-7

Saturday 22 April 2017

God Can Be Attained Assuredly Today

God is not accessible if there is simultaneously desire for living, respect, greatness, happiness, enjoyments etc. since God is unique, and only God is like God, there is none other like Him. Neither anyone was, nor is, nor would be, nor can be equal to Him at all.  The case being such, how can He be attained? He would be attained if there is want and thirst only for Him. What is the value of, perishable objects as compared to God? Can be ever be attained by perishable actions and objects? No! He cannot be attained! When the aspirant cannot remain without Him, then God too cannot remain without the aspirant, as it is God’s nature –
"Ye yathaa maam prapadyante, taanstathaiyyva bhajaamyaham."
(Gita 4/11)
"Howsoever men approach Me, even so do I seek them."  (Gita 4/11)

Suppose a mosquito wants to see an eagle, and the eagle also wants to see the mosquito, then would the mosquito reach the eagle first or would the eagle reach the mosquito first?  The power of the mosquito cannot be useful to approach the eagle.  On the power of the eagle would be useful in it.  Similarly, if there is a will to see God,  only the power of God will be useful.  Our power, our actions, our fate (destiny) would not yield anything. On the contrary only our ardent desire would work. There is nothing else which is required except our ardent aspiration.  

We can reach God, does it mean that God also can’t reach us ?   We can’t reach God by whatever power we may use.  But God verily dwells in our hearts! God appears to be away (far) from us, because we believe that God is away (far).   God had to first go to Dwarka and then come to Draupadi, because she invoked Him by addressing Him  as "Govind residing in Dwaarka". If she were to address Him as one who is near by, then He would have manifested Himself immediately ! If we believe that God will not be attained just now, then He would not be attained; as we ourselves have put a bar.

Friday 21 April 2017

भगवती तुलसी

श्री राधे राधे जी
                    आध्यात्मिक रहस्य
भगवती तुलसी

तुलसी से जुड़ी एक कथा बहुत प्रचलित है। श्रीमद देवि भागवत पुराण में इनके अवतरण की दिव्य लीला कथा भी बनाई गई है। एक बार शिव ने अपने तेज को समुद्र में फैंक दिया था। उससे एक महातेजस्वी बालक ने जन्म लिया। यह बालक आगे चलकर जालंधर के नाम से पराक्रमी दैत्य राजा बना। इसकी राजधानी का नाम जालंधर नगरी था।
दैत्यराज कालनेमी की कन्या वृंदा का विवाह जालंधर से हुआ। जालंधर महाराक्षस था। अपनी सत्ता के मद में चूर उसने माता लक्ष्मी को पाने की कामना से युद्ध किया, परंतु समुद्र से ही उत्पन्न होने के कारण माता लक्ष्मी ने उसे अपने भाई के रूप में स्वीकार किया। वहां से पराजित होकर वह देवि पार्वती को पाने की लालसा से कैलाश पर्वत पर गया।

भगवान देवाधिदेव शिव का ही रूप धर कर माता पार्वती के समीप गया, परंतु मां ने अपने योगबल से उसे तुरंत पहचान लिया तथा वहां से अंतध्यान हो गईं।

देवि पार्वती ने क्रुद्ध होकर सारा वृतांत भगवान विष्णु को सुनाया। जालंधर की पत्नी वृंदा अत्यन्त पतिव्रता स्त्री थी। उसी के पतिव्रत धर्म की शक्ति से जालंधर न तो मारा जाता था और न ही पराजित होता था। इसीलिए जालंधर का नाश करने के लिए वृंदा के पतिव्रत धर्म को भंग करना बहुत ज़रूरी था।

इसी कारण भगवान विष्णु ऋषि का वेश धारण कर वन में जा पहुंचे, जहां वृंदा अकेली भ्रमण कर रही थीं। भगवान के साथ दो मायावी राक्षस भी थे, जिन्हें देखकर वृंदा भयभीत हो गईं। ऋषि ने वृंदा के सामने पल में दोनों को भस्म कर दिया। उनकी शक्ति देखकर वृंदा ने कैलाश पर्वत पर महादेव के साथ युद्ध कर रहे अपने पति जालंधर के बारे में पूछा।

ऋषि ने अपने माया जाल से दो वानर प्रकट किए। एक वानर के हाथ में जालंधर का सिर था तथा दूसरे के हाथ में धड़। अपने पति की यह दशा देखकर वृंदा मूर्चिछत हो कर गिर पड़ीं। होश में आने पर उन्होंने ऋषि रूपी भगवान से विनती की कि वह उसके पति को जीवित करें।

भगवान ने अपनी माया से पुन: जालंधर का सिर धड़ से जोड़ दिया, परंतु स्वयं भी वह उसी शरीर में प्रवेश कर गए। वृंदा को इस छल का ज़रा आभास न हुआ। जालंधर बने भगवान के साथ वृंदा पतिव्रता का व्यवहार करने लगी, जिससे उसका सतीत्व भंग हो गया। ऐसा होते ही वृंदा का पति जालंधर युद्ध में हार गया।

इस सारी लीला का जब वंृदा को पता चला, तो उसने क्रुद्ध होकर भगवान विष्णु को शिला होने का श्राप दे दिया तथा स्वयं सति हो गईं। जहां वृंदा भस्म हुईं, वहां तुलसी का पौधा उगा। भगवान विष्णु ने वृंदा से कहा, ‘हे वृंदा। तुम अपने सतीत्व के कारण मुझे लक्ष्मी से भी अधिक प्रिय हो गई हो। अब तुम तुलसी के रूप में सदा मेरे साथ रहोगी। जो मनुष्य भी मेरे शालिग्राम रूप के साथ तुलसी का विवाह करेगा उसे इस लोक और परलोक में विपुल यश प्राप्त होगा।’

जिस घर में तुलसी होती हैं, वहां यम के दूत भी असमय नहीं जा सकते। गंगा व नर्मदा के जल में स्नान तथा तुलसी का पूजन बराबर माना जाता है। चाहे मनुष्य कितना भी पापी क्यों न हो, मृत्यु के समय जिसके प्राण मंजरी रहित तुलसी और गंगा जल मुख में रखकर निकल जाते हैं, वह पापों से मुक्त होकर वैकुंठ धाम को प्राप्त होता है। जो मनुष्य तुलसी व आवलों की छाया में अपने पितरों का श्राद्ध करता है, उसके पितर मोक्ष को प्राप्त हो जाते हैं।

उसी दैत्य जालंधर की यह भूमि जलंधर नाम से विख्यात है। सती वृंदा का मंदिर मोहल्ला कोट किशनचंद में स्थित है। कहते हैं इस स्थान पर एक प्राचीन गुफ़ा थी, जो सीधी हरिद्वार तक जाती थी। सच्चे मन से 40 दिन तक सती वृंदा देवी के मंदिर में पूजा करने से सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं।
*ज्ञानवर्धक , मार्गदर्शक , देशभक्ति एवं प्रभु प्रेम कि कथाएँ पड़ने के लिये इस पेज आध्यात्मिक कहानियों को ज़रूर लाईक करें तथा अपने मित्रों के साथ अवश्य शेयर करें , 
धन्यवाद जी*  !

श्री युगल से कुछ मत चाहिये

श्री युगल से कुछ मत चाहिये । कुछ भी नहीँ , फिर भी कहे वें तो उनसे उनके निज धाम के रसिकों की सीत प्रसादी , श्री रसिक किंकरी प्रसादी का विनय कीजिये । 
कुछ भी नहीँ माँगिये क्योंकि लोहा कभी कुंदन हो नही सकता , रसिक किंकरी वह दिव्य अमृत है जो पारस रूप लोहे को स्वर्ण बना देती है । 
निर्मल रसिक के हृदय में प्रियालाल का अनन्य रस का सार सुख है , जिसे भोगी के भोग बन्धन चिंतन कर ही नहीँ सकते । 
नित सीत प्रसादी मिल गई तो नित सन्निधि मिल गई । और हम कभी भी ऐसा सुख अपने प्रयास से नहीँ पा सकते है । जीवन में नित रसिक सीत प्रसादी पाना तो युगल का आपको ना छोड़ने का प्रण ही है । वह नित रस स्पर्श करते है ... यथा आहार तथा विहार । रसिक सन्त का आहार युगल अधरामृत है अतः वह सीत प्रसादी भगवत प्रसादी का सार समेटे हुए है । भगवत प्रसादी सीधे जब भोगी पाता है तो भगवत अधरामृत का चिंतन नही करता । रसिक प्रसादी में भाव ही अधरामृत का है , अतः सीत प्रसादी । 
सीत प्रसादी न मिलें तो ब्रज रज की एक कण पा लीजिये । मात्र एक कण , आंतरिक तृप्ति हेतु । बाह्य रस के लिये प्राकृत भोग को भगवत अर्पण कर दिव्य प्रसाद रूप अधरामृत रस सक्त पाईये । जयजय श्यामाश्याम । तृषित
[19/04, 10:48 PM] ‪+91 94504 57000‬: श्री राधे
1 राधा मेरे गृह में है,वो ही वन में भी है।वो मेरे पीछे है,वो ही मेरे आगे भी है।मैं उन सर्वव्यापी राधा की वंदना करता हु ।
2 राधा मेरी जिह्वा पे है,राधा मेरे कानों में है,राधा मेरी आँखों में है और मेरे ह्रदय में भी वो है।सब ओर व्याप्त उन राधा की मैं वंदना करता हु।
3 राधा मेरी पूजा है,राधा मेरा मंत्र जाप है,राधा मेरी हर प्रार्थना में है,राधा मेरे चिंतन में है।मैं उन राधा की वंदना करता हु।
4 मेरा हर गीत राधाजी का ही गुणगान होता है,जो भी मैं पाता हु,वो भी उन्ही का प्रसाद होता है।जहा भी मैं जाऊ,जहा भी रहु,राधा मुझे याद रहती है।उन राधाजी की मैं वंदना करता हु।
5 राधा माधुर्य को भी मधुरता प्रदान करती है।वो महत्ता को भी महत्व प्रदान करती है।उनसे श्रेष्ठ कोई नही।वो सुंदरता को भी सौंदर्य प्रदान करती है।वो सर्वाधिक सुन्दर है,अनुपम है,कोई उपमा नहीं।
6 राधा अमृत सिंधु है,सौभाग्य कुसुम है।सारा सौभाग्य एकत्रित हो तब जो सौभाग्य पुष्पित हो वो राधा है।
7 उनका वदन (मुख)कमल(अरविन्द) की तरह है इसलिए उनका नाम कमला भी है।उनकी उपासना पद्मयोनि ब्रह्माजी भी करते है जो की पद्मनाभ विष्णु जी के नाभि कमल में प्रकटे है।
वो जब शिशु रूप में पिता वृषभान जी को मिली तब भी वो कमल पर विश्रामवस्था में पधारी थी।
8 राधा का मन प्राण सर्वदा कृष्ण में डूबा या निमज्जित रहता है और कृष्ण का राधा में।राधा ही वृन्दावन की महारानी है।
9 राधनाम सर्वदा मेरी जिह्वाग्र पर होता है।उनका अद्वितीय सुन्दर स्वरूप मेरी आँखों में रहता है।उनके गुणगान सदा मेरे कानों में गूँजते रहते है।राधा सदा मेरे मन में विचारो में रहती है।
: 10 जो सौभाग्यशाली व्यक्ति भगवान् श्री कृष्ण के द्वारा की गई इस स्तुति को श्रद्धा सहित मनोयोग से पढ़ेगा,वो श्री राधा कृष्ण चरणों में प्रेमपूर्ण सेवा प्राप्त करेगा।
11 श्रीमति राधिका जी श्री कृष्ण को निरंतर अपने ह्रदय में धारण करति है,निरंतर प्रेम से उनकी पूजा वंदना करती है,और श्री कृष्ण राधा जी की।
श्री कृष्ण श्री राधा के ह्रदय को मन को निरन्तर आकर्षित करते है,और श्री राधाजी श्री कृष्ण के ह्रदय को।
जो भी इस प्रार्थना को पढ़ेगा वो निश्चित रूप से युगल चरणों में ऐसी ही अविरल रति प्राप्त करेगा।
जय जय श्री राधे

श्री राधा रहस्य

श्री राधा रहस्य, कौन जानता है ?
· 
ब्रज धाम में किसी राजा का नहीं बल्कि रानी का राज चलता है ! और ये रानी कोई और नहीं, हमारी प्यारी लाडली सरकार श्री राधा रानी जी हैं ! श्री राधा जी को श्रीकृष्ण की आत्मा कहा जाता है ! ये श्री वृषभानु जी और कीर्तिदा जी की पुत्री थीं। पद्म पुराण में श्री वृषभानु जी को राजा बताते हुए कहा गया है कि यह राजा जब यज्ञ की भूमि साफ कर रहे थे तब उन्हें भूमि कन्या के रूप में श्री राधा मिली !

राजा ने उन्हें अपनी कन्या मानकर पालन पोषण किया। श्रीराधा जी के बारे में एक दूसरी कथा यह भी मिलती है कि भगवान श्रीविष्णु ने श्रीकृष्ण अवतार लेते समय सभी देवताओं से पृथ्वी पर अवतार लेने के लिए कहा तो भगवान विष्णु की अर्धांगिनी माँ लक्ष्मी, राधा जी बनकर पृथ्वी पर आईं।

श्री राधा जी के महात्म वर्णित स्तुति है,
 
त्वं माता कृष्ण प्राणाधिका देवी
कृष्ण प्रेममयी शक्ति शुभे,
पूजितासी मया सा च या श्री कृष्णेन पूजिता,
कृष्ण भक्ति प्रदे राधे नमस्ते मंगल प्रदे !

अर्थात – हे श्री राधा, आप श्री कृष्ण के प्राण (अधिष्ठात्री देवी) हैं तथा आप ही श्री कृष्ण की प्रेममयी शक्ति तथा शोभा हैं ! श्री कृष्ण भी जिनकी पूजा करते हैं वे देवी मेरी पूजा स्वीकार करें ! हे देवी राधा, मुझे कृष्ण भक्ति प्रदान करें मेरा नमन स्वीकार करें तथा मेरा मंगल करें !

हे दीनबन्धो दिनेश सर्वेश्वर नमोस्तुते,
गोपेश गोपिका कांत राधा कांता नमोस्तुते !

अर्थात – हे दीनबंधो, दिनेश, सब ईश्वरों के ईश्वर, प्रभु मेरा नमन, मेरी स्तुति स्वीकार करें ! आप गोपिओं के ईश्वर एवं प्राणनाथ हैं तथा श्री राधा जी आपकी प्राण (अधिष्ठात्री देवी) हैं ! प्रभु मेरा नमन मेरी स्तुति स्वीकार करें !

श्री राधा जी का मुख्य मंदिर बरसाना ग्राम की पहाड़ी पर स्थित है। यहां की लट्ठमार होली विश्व प्रसिद्ध है। श्रीराधा, भगवान श्रीकृष्ण की शक्ति हैं। श्रीकृष्ण के प्राणों से ही इनका प्रादुर्भाव हुआ है। श्रीकृष्ण इनकी नित्य आराधना करते हैं। इनके माता पिता श्री वृषभानु जी एवं माँ कीर्तिदा जी ने पूवर्जन्म में पति पत्नी के रूप में कई वर्षों तक कठिन तप करके ईश्वर से श्री राधा जी को पुत्री रूप में पाने का आशीर्वाद प्राप्त किया था !

इस प्रकार द्वापर के अंत में योगमाया ने श्रीराधा के लिए उपयुक्त क्षेत्र की रचना कर दी। भाद्र शुक्ल अष्टमी दिन सोमवार के मध्यान्ह में कीर्तिदा रानी के प्रसूतिगृह में सहसा एक दिव्य ज्योति फैल गयी। उस तीव्र ज्योति से सबके नेत्र बंद हो गये। जब गोप सुंदरियों के नेत्र खुले तो उन्होंने देखा, एक अति सुंदर कन्या कीर्तिदा जी के पास पड़ी है। कीर्तिदा रानी ने अपनी कन्या को देखकर प्रसन्नता से एक लाख गोदान का संकल्प किया। बालिका का नाम राधा रखा गया।

एक बार देव ऋषि नारद ने ब्रज में श्रीकृष्ण का दर्शन किया। उन्होंने सोचा जब स्वयं गोलोक विहारी श्रीकृष्ण भूलोक पर अवतरित हो गये हैं तो गोलोकेश्वरी श्रीराधा जी भी कहीं न कहीं गोपी रूप में अवश्य अवतरित हुई होंगी ! घूमते घूमते देव ऋषि श्री वृषभानु जी के विशाल भवन के पास पहुंचे।

श्री वृषभानु जी ने उनका विधिवत सत्कार किया। फिर उन्होंने देव ऋषि से निवेदन किया कि, भगवन ! मेरी एक पुत्री है वह सुंदर तो इतनी है मानो सौन्दर्य की खान हो किंतु हमारे विशेष प्रयास के बाद भी वह अपनी आंखें नहीं खोलती है ! आश्चयर्चकित देव ऋषि नारद वृषभानु जी के साथ श्रीराधा के कमरे में गये वहां बालिका का अनुपम सौन्दर्य देखकर देव ऋषि के विस्मय की सीमा न रही।

नारदजी के मन में आया निश्चय ही यही श्रीराधा हैं ! वृषभानु को बाहर भेजकर उन्होंने एकांत में श्रीराधा की नाना प्रकार से स्तुति की किंतु उन्हें श्रीराधा के दिव्य स्वरूप का दर्शन नहीं हुआ। जैसे ही देव ऋषि नारद ने श्रीकृष्ण वंदना करना शुरू की वैसे ही दृश्य बदल गया और देव ऋषि नारद को किशोरी श्रीराधिका जी का दर्शन हुआ। सखियां भी वहां प्रकट होकर श्रीराधा को घेर कर खड़ी हो गयीं। श्रीराधा देव ऋषि को अपने दिव्य स्वरूप का दर्शन कराने के बाद फिर से पालने में बालिका रूप में प्रकट हो गयीं। देव ऋषि नारद गदगद कण्ठ से श्रीराधा का यशोगान करते हुए वहां से चल दिये।

ब्रम्हवैवर्तपुराण में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने और श्रीराधा के अभेदता का प्रतिपादन करते हुए कहा है कि श्रीराधा के कृपा कटाक्ष के बिना किसी को मेरे प्रेम की उपलब्धि हो ही नहीं सकती। वास्तव में श्रीराधा और श्री कृष्ण एक ही देह हैं। श्रीकृष्ण की प्राप्ति और मोक्ष दोनों श्रीराधाजी की कृपा दृष्टि पर ही निभ्रर हैं।

उन अनन्त ईश्वर श्री कृष्ण की अनन्त शक्ति श्री राधा को पूरी तरह से जानना, क्या किसी जीव के लिए सम्भव है ! इस प्रश्न का उत्तर भी कोई श्री राधा कृपा प्राप्त साधक ही दे सकता है !

श्री कृष्ण की आराध्या के रूप में श्री राधा रानी की पूजा की जाती है। वृंदावन के सेवाकुंज मंदिर में श्री कृष्ण, श्री राधा की चरण सेवा करते हैं। बेंणी गूंथते हैं और अपनी आराध्या को प्रसन्न करने के हरसंभव प्रयास करते हैं। कहा जाता है कि श्री कृष्ण को पाने के लिए श्री राधा को पाना जरूरी है। यह भी कहा जाता है कि श्री राधा की भक्ति करने वाले के पास प्रभु श्री कृष्ण स्वयं चलकर आते हैं।

श्री वृषभानुनंदिनी राधा जी की भक्ति भी बहुत सरल है। श्री राधा नाम का स्मरण जप या भजन कर लेने मात्र से प्राणी का निश्चित ही उद्धार हो जाता है !
 
श्री राधा राधा राधा

Wednesday 19 April 2017

God Can Be Attained Assuredly Today

To attain God is very easy. Nothing is as easy as attaining God. But there should be want of God only and not anything else. As none else is equal to  God. As the Lord is extraordinary, want for Him also should be extraordinary.  Three things are necessary for attaining worldly enjoyments – 1) Want 2) Effort and 3) Destiny.  

To get worldly objects, the very first thing necessary is want (i.e. desire) for it.   Then for its acquisition, one needs to make an effort. After making effort,, it will be acquired, only if one is destined to get it. If one is not destined to receive then even on wanting and making the effort, one will not receive it.  That is why if we try for profit, but loss is incurred ! But God is attained only by aspiration and wanting (icchaa). In this, neither effort nor destiny play a role, nor are they required. In this path of divinity there are never any losses, there is gains and only gains (naffaa).

Nothing except God can be attained only by desire. The reason for this is that human body has been availed only to attain Him.   God has bestowed upon us this human body,  only for the purpose of attaining Him.

The second point is that God is Omnipresent (in all places). Not even the space where the sharp tip of a needle can stand is vacant without God. Therefore in attaining God, effort and destiny are of no use at all. By effort only those things are attained that are perishable. The imperishable Paramatma cannot be attained through effort. Realization of Paramatma is only from ardent longing and desire.

God Can Be Attained Assuredly Today

Whether one is a male or a female, an ascetic (saadhu) or a householder (grahasth), literate or illiterate, child or youth, whatever one may be, simply by true and ardent desire he / she  can attain God.   But on condition that except for God, there should not be desire for life or death, no desire for enjoyments or accumulation (hoarding). Things will not perish (nor become inaccessible or nor existent) without desires.  We are to get surely what is destined for us.   No one else can get the thing that is destined for us, – "yadasmadeeyam na hi tatparesam" -  ‘what belongs to us, cannot be for others.’   How can anyone other person suffer from the fever that we have are to suffer ? In the same way, if property is destined for us, we are to surely get it. But there is no destiny, with regards to attainment of God.

God cannot be attained by paying any price for it. Only that thing can be attained by giving a certain price,  that is of lesser value than the listed price.   The things that are available in the market, they do not cost as much as the price they are listed for (sales price). We have assuredly nothing (objects or action) so valuable, by which God can be attained. That God is unique (one without another), eternal, almighty (powerful), everlasting and omnipresent. He is ours and within us  -

Sarvasya chaaham hrdi sannivshth" (Gita 15:15).
"I reside in the hearts of all beings" (Gita 15:15)
"Ishvar sarva bhootaanaam hrdeshe'rjun tisthati." (Gita 18:61).
"O'Arjuna, Ishvar resides in the hearts of all beings."

He is not away from us. If we go into the 8.4 million wombs then too God will dwell in our hearts; and even if we go to heaven or hell. He would dwell in our hearts, even if we become beasts, birds, trees, etc. Even if we become demi-gods (devataas) then too He will reside in our hearts.   And He would do the same, even if we become liberated or become God-realized souls.  That God would dwell in our heart, even if we become the vilest of all sinners, worst of criminals, and most unjust.  Can the attainment of such God dwelling in the hearts of all be difficult?  

My Lord is hard to see



My Lord is hard to see as the changeless one
My Lord is easy to see as the changeless one
(Thiruvaimozhi 1.3, of Nammalvar)
Is it very difficult to attain Krishna? Certainly! Krishna is the Supreme Lord of all that be. Even great demigods find it difficult to approach Him, then what can be said of tiny humans like us. But, there is another happy side to it. Krishna is also very easy to attain.  While those who desire to attain Him, He is very easily accessible. Oh! Just think how wonderful, how merciful, and how much accessible is our Lord. He tries to make Himself accessible at all times and to everyone. And we the sinful people, we do not even try to reciprocate with Him and accepts His invitation. We, out of our own foolishness and self-preoccupation, have made Him difficult to be attained, although He always tries to make Himself easily accessible.
Lord Krishna is so compassionate towards His devotees and so ever eager to award His vision to them, that He not only overlooks all offenses committed by them.  And He is always so eager to award them the fruit of their devotion, but rather continuously searches for an excuse to award them His mercy. Oh! He is bound to us by His grace. He is in us and we are in Him.
My Lord is one who leaves if left, if restrained He stays.
My Lord is hard to reach, my Lord is easy to reach.
Let us sing and praise His infinite glory,
And enjoy His union, ceaselessly, night and day
(Thiruvaimozhi 1.7, of Nammalvar)

I want to only realize KRSNA



I want to only realize KRSNA. Whether others criticize us or praise us, whether we gain wealth or lose it, whether the body remains healthy or not,  whether we are alive or we die, but we will remain immovable and unshakable on this decision.
The attractions and aversion in the world are like a maze. This is good, this is not good - in this the man becomes so lost that it is difficult from him to get out of the maze. Therefore to get out of it, make one firm  determination that I will only walk the path towards KRSNA.  I do not want any attraction for the world, nor do I want to have any hatred towards it.  
In front of us favorable and unfavorable situations have come many times and they have gone away. It is only our delusion that if we get such a family, then we will be benefited, if we get such a wife then it will be great; if we get that much wealth then we will be gratified; if we get this higher position, then we will be contented etc. Has no one found a favorable wife? Has no one found a proper son? Has no one found a favorable situation? Then too have they become free of desires and realized KRSNA? Whoever has received these favorable things, their desires have not ended. He has not become free of acquiring more. Therefore it is impossible for anyone to  be benefited by these situations. You firmly decide on that one goal, one aim of KRSNA Realization, then favorable situations will run after you.

You become Krishna conscious



That is Krishna’s intelligence, how He adjusts. He gives everyone freedom. And everyone is given facilities, but still He’s in botheration. Therefore Krishna advises to his devotees that “Don’t plan anything.  you nonsense, you don’t give Me trouble.
Please surrender unto Me. Just go under My plan; you’ll be happy. You are making plan, you are unhappy; I am also unhappy. I am also unhappy. (laughter) So many plans are coming daily, and I’ll have to fulfill.” But He’s merciful. If a… Ye yatha mam prapadyante tams…
So except the devotee of Krishna, everyone is simply giving Krishna trouble, trouble, trouble, trouble. Therefore, they are called duskrtina. Duskrtina, most miscreant, the miscreants. Don’t make any plan. Accept Krishna’s plan.
That will be simply giving trouble to Krishna. Therefore, a devotee does not pray even for his maintenance. That is pure devotee. He doesn’t give trouble to Krishna even for his bare maintenance. If he has no maintenance, he’ll suffer, fasting; still, he’ll not ask Krishna, “Krishna, I am very hungry.
Give me some food.” Of course, Krishna is alert for His devotee, but a devotee’s principle is not to place any plan to Krishna. Let Krishna do. Simply we have to do according to the plan of Krishna.
So what is our plan? Our plan is, Krishna’s says, sarva-dharman parityajya mam ekam saranam [Bg. 18.66]. Man-mana bhava mad-bhakto mad-yaji. So our plan is the same thing. We are simply canvassing for Krishna, that “You become Krishna conscious.”

Krishna is the Supreme Personality of Godhead

"Men in this world desire success in fruitive activities, and therefore they worship the demigods. Quickly, of course, men get results from fruitive work in this world." (Bhagavad Gita 4.12)

Many people get confused when it comes to God and the demigods. Krishna is the Supreme Personality of Godhead and He is param-isvara, the Supreme Controller and there can never be any other controller equal to or greater than Krishna. However there are many other isvaras or controllers in the universe who have varying degrees of power over different departments of the universal management.

Actually Krishna is not directly engaged in managing the affairs of the material world. Krishna is, of course, all-cognizant, so He is conscious of everything that is going on, and Krishna is all-powerful so He can do anything that He wants to at any time. Ultimately therefore Krishna is in control of everything however He is not directly connected with managing the affairs of the material world. Krishna has more important business: dancing with the gopis and playing with His cowherd boyfriends and cows and calves in the forests of Vrindavan. He has no interest in personally managing the affairs of the material world.

So, to ensure the affairs of the material world go on nicely Krishna has appointed many managers for all the different departments that need to be looked after in the material world. Krishna's managers in the material world are called 'demigods'. The demigods are all devotees of Krishna but they still have some material attachments therefore they are still trapped in the material world. However because the demigods are devotees they get promoted to the higher planets in the universe where they can live a very long life and enjoy a very high standard of material sense gratification and they are also given great positions of power and responsibility over various departments requiring managing in the material world.

In this way Krishna delegates the management of the affairs of this and the many other universes in the material world to His devotees who still have some material attachments so He can simply enjoy in Vrindavan.

Actually these demigods are just like us. They are ordinary living entities like you and me but as a result of their performance of sacrifices and practice of austerities they have been elevated to the higher planets and have been given positions of power and responsibility by Krishna. It is just like if a whole group of young men start working for a particular company they are all the same in the beginning but some will become very successful and be promoted in the company and become managers and get powerful positions and some will not. So the demigods are like the successful workers in the company who have been promoted to high management positions. In reality there is no difference between the managers in the company and the ordinary workers. It is just that the managers, as a result of there hard work and dedication to the company, have been promoted to the high management positions.

But Krishna is not like that. Krishna is always Krishna -- The Supreme Personality of Godhead. He does not have to work to advance in the universal management system and fight his way to the top like the demigods have to. No. Krishna is the Supreme Personality of Godhead eternally. He is always on the top. And Krishna is actually all-powerful, whatever He desires immediately happens. The demigods are not like that. Krishna has given them some authority over some department so in that department they have some power but they have no power in other departments and they have no power to grant anyone liberation from the material world.

For example Lord Indra is the King of Heaven and he is in charge of the clouds and weather and lightning. So Indra is very wealthy and lives on his heavenly planet with his associates in a very opulent and comfortable way and he has power over the weather -- that is the service Krishna has given him. So if one wants to be blessed with good weather so his agricultural activities will be a success he may worship Lord Indra for this purpose and because Indra is the controller of the weather if Indra is pleased he can send the clouds to that farmers place and give nice rains so his agricultural activities are successful. Also if one worships Indra and thinks of him at the time of death he can be transferred to the heavenly planet that Indra lives on and live a very comfortable life there.

But Lord Indra's powers are very limited. Beyond controlling the weather and ruling over his heavenly planet he does not have any authority anywhere else. And his authority is given to him by Krishna. So with a little contemplation one can see that there are many millions of demigods in charge of the countless departments in the material world that effect us in our day-to-day lives. So if we want to worship demigods to satisfy them individually one-by-one that will be a very difficult task. In India there are people who try to do this. They have a huge list of demigods and try to worship them all for different boons or benefits.

The benedictions of the demigods are strictly limited to material benefits. They can not give spiritual benefits because they themselves are not liberated from the material world. Even though the demigods live on planets with a standard of living far, far higher than the standard of living we have on earth, still they have material bodies which will also get old, get sick and die. They may live for fabulously long periods of time but ultimately their material bodies will also get old, get sick and die.

In India there is a great misconception about these gods or demigods of this material world and men of less intelligence, although passing as great scholars, take these demigods to be various forms of the Supreme Lord. They make no distinction between Krishna and the material demigods considering that worship of any of the 'gods' is equal to the worship of Krishna.

Actually, as we have discovered, the demigods are not different forms of God, but they are all Gods different parts and parcels--just like we are. God is one and the parts and parcels are many. The Vedas say: nityo nityanam: God is one and isvara parama krsnah: "The Supreme God is one--Krishna". The demigods are delegated with powers by Krishna so they can manage this material world. The demigods are living entities like us with different grades of material power. They can never be equal to the Supreme God--Narayana, Vishnu or Krishna.

Anyone who thinks that God and the demigods are on the same level is called an atheist, or pasandi. Even the great demigods like Brahma and Shiva can not be compared to the Supreme Lord. In fact the Lord is worshiped by the demigods such as Brahma and Shiva (siva-virinci-nutam). The demigods are powerful men within this material world in the same way that the President of the United States is a powerful man in this world. In our experience we see that many human leaders are worshiped by foolish men with the idea that through that worship and service they will get some material benefit from the great leader. People are working hard in their company worshiping and trying to please their 'boss' so they will get promoted within the company and earn more money. That is demigod worship. The 'boss' is a person who has achieved a higher position in the company by worshiping the company leaders and serving them and performing austerities like working hard and doing overtime without pay... As a result he has advanced in the company and has some power and authority over a small section of the company. Worshiping the boss at work and worshiping demigods like Brahma, Shiva, Indra, Kali, Durga, etc. is EXACTLY the same thing. Just like worshiping the boss at work will not help you at all spiritually, but it may help to increase your pay packet a little, worshiping the demigods can not help you spiritually but it may provide some temporary material benefits.

However Narayana, Vishna or Krishna, the Supreme Personality of Godhead, does not belong to this world. He is above, or transcendental to material creation. Even Sripada Sankacharaya, the leader of the impresonalists, maintains that Narayana or Krishna is beyond this material creation.

Foolish people worship the demigods because they want immediate results. They get the results, but they do not know that the results so obtained are temporary and are meant for less intelligent persons. The intelligent person is in Krishna consciousness and he has no need to worship the paltry demigods for some immediate, temporary benefit. The demigods of this material world, as well as their worshipers, will vanish with the annihilation of this material world. The boons or benedictions of the demigods are material and temporary. Both the material worlds and their inhabitants, including the demigods and their worshipers, are bubbles in the cosmic ocean.

In this world human society is mad after temporary things such as the material opulence of possessing land, family and enjoyable paraphernalia and to achieve these things they worship demigods or powerful men in human society. If a man gets some ministership in the government by worshiping a political leader, he considers that he has achieved a great boon.

So we find everywhere in this world that people are worshiping the so-called leaders or "big guns" in order to get temporary benefits, and they actually achieve such things. Such foolish men are not interested in Krishna consciousness for the permanent solution to the hardships of material existence. They are all after sense enjoyment and to get a little facility for sense enjoyment they are attracted to worship empowered living entities known as demigods.

This verse indicates that people are rarely interested in Krishna consciousness. Generally they are mostly interested in material enjoyment and therefore they worship some powerful living entity in an attempt to achieve this...