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Sunday, 18 October 2015

कृष्णं वन्दे जगद् गुरुम् , सूत्र लो गले उतार।



कृष्णं वन्दे जगद् गुरुम् , सूत्र लो गले उतार।
जिनको गुरु तुम कररहे, वे खाक लगाऐं पार।।
क्योंकि न पूंजी पास उन, भक्ति, भगवन्नाम।
उनके पास तो भवन हैं, और करोडों दाम।।
उन्हें भूख सम्मान की , उन्हें न चहिए तत्व।
उनको, अरु उन नजर में, केवल मान महत्व।।
गर तुमको, हरि चाहिए , और वास हरिधाम।
तो खुद के गुरु खुद बनो, उन्हें न रोटीराम।

अपने भक्तों पर कृपा , जब करते हैं कृष्ण।
तो उसके, पैदा करें , मन में एक ही प्रश्न।।
कि यह जो मैंसब कररहा,तब आए क्या काम
जब न्यौता यमराज का, आए " रोटीराम "।।
चूंकि वो रिश्वत ले नहीं, सो यह सब तब व्यर्थ।
फिरमैं क्यों वहसब भरूँ, जिसका कुछ नहीं अर्थ
वह क्यों? नहीं जोडूं जिसे , ले जा पाऊं संग।
यही सोच देती सिखा , उसे मरण का ढंग।।
हरी शरणम् l l
" रोटीराम " ऋषिकेश

Tuesday, 6 October 2015

आजसे ही याद कर लो कि 'कृष्णं वंदे जगद्गुरुम्!



आजसे ही याद कर लो कि 'कृष्णं वंदे जगद्गुरुम्!
जिससे प्रकाश मिले,ज्ञान मिले,सही मार्ग दीख जाय,अपना कर्तव्य दीख जाय,अपना ध्येय दीख जाय,वह गुरु-तत्त्व है।वह गुरु-तत्त्व सबके भीतर विराजमान है।वह गुरु-तत्त्व जिस व्यक्ति,शास्त्र आदिसे प्रकट होता है,वह गुरु कहलाता है; परंतु मूलमेँ भगवान ही सबके गुरु हैँ।भगवानने गीतामेँ कहा है की 'मैँ ही सब प्रकारसे देवताओँ और महर्षियोँका आदि अर्थात् उनका उत्पादक,संरक्षक,शिक्षक हूँ'- 'अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः' (गीता 10.2)।अर्जुनने भी विराटरुप भगवानकी स्तुति करते हुए कहा है कि 'भगवन्! आप ही सबके गुरु हैँ'- 'गरीयसे' (गीता 11.37); 'गुरुर्गरीयान्' (गीता 11.43)।अतः साधकको गुरुकी खोज करनेकी आवश्यकता नहीँ है।उसे तो 'कृष्णं वंदे जगद्गुरुम्' के अनुसार भगवान् श्रीकृष्णको ही गुरु और उनकी वाणी गीताको उनका मंत्र,उपदेश मानकर उनके आज्ञानुसार साधन मेँ लग जाना चाहिए।यदि साधकको लौकिक दृष्टिसे गुरुकी आवश्यकता पड़ेगी तो वे जगद्गुरु अपने-आप गुरुसे मिला देँगे; क्योँकि वे भक्तोँका योगक्षेम वहन करनेवाले हैँ- 'योगक्षेमं वहाम्यहम्' (गीता 9.22)।...[पृ॰सं॰8 से] मेरे से कोई पूछता है तो मैँ कहता हूँ कि भगवान श्रीकृष्णको गुरु मान लो-'कृष्णं वंदे जगद्गुरुम्।'
श्रद्धेय स्वामीरामसुखदासजी 'सच्चा गुरु कौन' पुस्तक से